स्थापना तथा कथा
भारतीय ग्रंथो के अनुसार एक बार एक लंका के राजा रावण ने हिमालय पर तपस्या कर रहा था तब भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उससे पूछा की बताओ वत्स क्यों तपस्या कर रहे हो उन्होने कहा की हमे आपका शिवलिंग चाहिए ताकि हम अपने महल में रख सके क्योंकि मेरे पास सभी चीज है धन है दौलत और भगवान की मूरत लेकिन आपका नहीं है इसलिए मुझे शिवलिंग चाहिए ताकि आप मेरे महल में आप रह सको बस सको । तो
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भगवान शिव ने कहा ठीक है वत्स वैसा ही होगा लेकिन एक सर्त है की शिवलिंग ले जाते समय कहीं रास्ते में उसे रखना नहीं है रावण बोला ठीक है गुरु देव । भगवान शिव तो दे दिया लेकिन रावण अपने राज्य में ले जा रहा ही था की रास्ते के बीच में लघुसंका लग गया जिससे की उस समय जब ज़ोर से लघुसंका लगा था उसके आस पास कोई व्यक्ति नज़र नहीं आने के कारण वह शिवलिंग देवघर में पेशाब लग गया था और यही पर रख कर हल्का हो रहा था उसी समय भगवान शिव को वचन तोड़ा जिससे की भगवान फिर से नही उठे और रावण ने खूब ज़ोर लगा कर प्रयास किया उठाने में कोई सफलता नही मिली तब उसी दिन से रावण छोड़ के चल गया और कुछ समय बाद एक चरवाहा गाय चराने के लिए उसी क्षेत्र में जाता था और ऐसा हुआ की उसके गाय प्रतिदिन दूध शिवलिंग पर गिरा देती थी जब उसे पता चला की मेरी गाय ने तो ऐसा कार्य कर रही है है तो वह चरवाहा ने प्रतिदिन का नियम बना लिया की अब हम हमेसा चार डांटा मारुंगा शिवलिंग को उसी में एक दिन वह चरवाहा ने एक दिन खाना खा के मारने गया तो भगवान शिव की दर्शन हुये तभी चरवाहा ने भावुक होकर रोने लगा और बोला की मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गयी है मुझे माफ करो तब शिव जी ने उस चारवाहे को अपने पैर से उठा कर बोले की इसमे तुम्हारा कोई गलती नहीं फिर उसमे बहुत तरह से शिव जी ने बताया कहानी को और उस चारवाहे को बताए की आज से तुम यहाँ पुजा करोगे । वह व्यक्ति घर जाकर अपना हलिया बताया उसके बाद से प्रशिद्ध मंदिर बाब बैजनाथ धाम कहे जाने लगा ।
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