विद्यालय का नया कानून
sarkari school ke naye kanun
350 स्कूलों से उर्दू नाम हटा दिया, 509 स्कूल से जुमा की छुट्टी समाप्त कर दिया और 459 स्कूल में हाथ जोड़कर प्रार्थना करने का निर्देश दिया है शिक्षा विभाग ने।
जिसकी जानकारी सदन में दी गई।
बहुत तेजी दिखाई कार्रवाई करने में महागठबंधन सरकार ने, ना पक्ष सुना ना कागजातों को माना और ना ही जानकार लोगों से वार्ता करना जरूरी समझा।
जबकि झारखंड अलग राज्य से पहले के स्कूलों की छात्र पंजी एवं शिक्षक स्थांतरण/ पदास्थापन देखा जाए तो उर्दू स्कूल ही मिलेंगे।
वहीं वर्ष 2000 में सर्व शिक्षा अभियान के तहत अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में खोले गये स्कूलों जिसका संचालन संधारण शिक्षकों की न्युक्ति ग्राम शिक्षा समिति के अध्यक्ष एवं सचिव के देख-रेख में होता था, जब वहां पढ़ने वाले छात्र भी शत-प्रतिशत उर्दू भाषी थे/है।
तो उन विधालयों का नाम भी ग्राम शिक्षा समिति ने उर्दू विधालय ही रखा। 18 से 20 वर्षों तक किसी भी सरकार और अधिकारीयों को कोई आपत्ति नही हुई लेकिन एका-एक स्कूल के बोर्ड से उर्दू विधालय का नाम हटाकर समान्य विधालय करना घोर अन्याय है जबकि झारखंड की दूसरी राज्य भाषा उर्दू है और अधिसूचना 6807 के अनुसार उर्दू में भी बोर्ड पर नाम लिख सकते है।
स्कूलों में साप्ताहिक छुट्टी दी बिहार शिक्षा संहिता 1961 के तहत रविवार के बजाय शुक्रवार को रखा गया तो नियमविरूध कैसे हो गया।
क्या देश का संविधान शिक्षक एवं छात्रों को अपनी धार्मिक कार्य करने की इजाजत नही देती है।
राज्य में उर्दू से जुड़े कई मसले है
हाईकोर्ट ने रिट याचिका 174/2018 में सरकार को +2 स्कूलों में उर्दू शिक्षकों के पद सृजित करने को कहा था जो शिक्षा विभाग पद वर्ग समिति के पास लटका पड़ा है।
4401 उर्दू शिक्षक बचे 3712 पदों को स्नातक उर्दू टेट उत्तीर्ण से भरने का मामला लम्बित है।
हाईस्कूल में 192 उर्दू शिक्षक के पद अनुसूचित जाति एव अनुसूचित जनजाति के नाम पर वर्षों से खाली है जिसे पिछड़ा एवं समान्य वर्ग से भरने का मामला लम्बित है।
उर्दू प्रारम्भिक विधालयों में उर्दू भाषा लिपि में किताबें नही दी जाती।
उर्दू मिडिल स्कूल से 8वीं क्लास में उर्दू विषय को अनिवार्य विषय से हटाकर दिया गया।
प्रशिक्षण परीक्षा अब उर्दू लिपि में नही होती।
ऐसे कई मामलें उर्दू से जुड़ा हुआ है।
लेकिन सरकार जनहित/ उर्दूहित से जुड़े मामलों पर काम करने के बजाय उर्दू स्कूलों के साथ ज्यादाती कर रही है।
अफसोसनाक स्थिति तो यह है कि समाज के पोलिटिकल लीडर, सोशल वर्कर, बुद्धिजीवी, दानिशवर उर्दू के शिक्षक और उलमा हज़रात लगभग सभी खंमोश है जैसे कुछ हुआ ही ना हो।
अगर लड़ नही सकते तो कम से कम लड़ने वालों का साथ तो दीजिए।
खुद नही जा सकते तो आर्थिक सहयोग तो कीजिए।
खैर सरकार के उर्दू विरोधी निर्णय के खिलाफ़ एवं अन्य मांगों को लेकर लोकतांत्रिक तरीके से 23 अगस्त 2022 दिन मंगलवार को 11 राजभवन के समक्ष आमया संगठन के द्वारा महाधरना दिया जाएगा।
अगर आ नही सकते तो अपने अपने जिलों में संगठित होकर शांतिपूर्ण एवं लोकतांत्रिक तरीके से 23 अगस्त मंगल को विरोध जरूर करे।
ताकि खुद का जिंदा होने की अहसास हो सके।
झारखंड छात्र संघ एवं आमया संगठन, रांची
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