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भारत के लिए समुद्री मार्ग की खोज किसने की थी और कब?

20 मई 1498 को,एक पुर्तगाली नाविक वास्कोडिगामा गेट ऑफ गुड होप को पार करते हुए भारत में कालीकट पहुंचा कालीकट के हिंदू शासक राजा जमोरिन ने उसका गर्मजोशी से स्वागत किया पुर्तगाली खोजकर्ता वास्कोडिगामा अटलांटिक महासागर के रास्ते भारत पहुंचने वाला पहला यूरोपीय बन गया जब हुआ मालाबार तत्पर कालीकट पहुंचा



मैसियर 87 की खोज किसने की थी?

मशीये 87 (messier 87), जिसे वर्गो ए (Virgo A) एनजिसी 4486 (N.G.C 4486) और एम 87 (M 87) भी कहा जाता है अभिकाय अंडाकार गैलेक्सी है यह कार में कन्या तारामंडल के क्षेत्र में नजर आती है और पृथ्वी से लगभग 3.35प्रकाशवर्ष दूर स्थित है हमारी गैलेक्सी क्षीरमार्ग, के समीप स्थित सबसे विशाल गैलेक्सीओ मे से एक है इसमें गोल तारा गुच्छ की संख्या असाधारण है जहां क्षीरमार्ग कि केवल 50 - 200 गोल तारा गुच्छ परिक्रमा कर रहा है वहां एवं 87 में 12000 है एवं 81 अपने केंद्र से उभरते हुए विशाल खगोल भौतिक फौवारे के लिए भी प्रसिद्ध है जो 4900  प्रकाशवर्ष लंबा है। और जिसमे पदार्थ अपेक्षित जातियों से यात्रा कर रहा है।




शतरंज की खोज किस देश में हुई और कब हुई ?


शतरंज के आबिस्कार का श्रेय भारत को ही जाता है , क्योंकि प्राचीनकाल से ही इसे भारत में खेला जाता रहा है इसका धर्मग्रंथ और प्राचीन भारतीय संस्क्रा सीहत्य में उल्लेख मिलता है इस खेल की उत्पति भारत में कब और कैसे हुई यह निश्चित रूप से नही कहा जा सकता शतरंज एक प्रकार के युद्ध का खेल है गौरतलब है कि उस दौर में भारत में राजा होते थे और वो अक्सर युद्ध करते थे ऐसे में इस खेल के जरिए वे न सिर्फ अपना मनोरंजन करते बल्कि खुद को मानसिक तौर पर मजबूत भी करते थे इसमें दो अलग - अलग पक्षों के मोहरे होते है जिनका मुख्य लक्ष्य एक दूसरे के पक्ष के राजा वाली मोहर को मारना होता है शतरंज 7 वीं शताब्दी से कुछ समय पहले भारत में पैदा हुआ था यह खेल भारतीय खेल चतुरंगा से लिया गया था हिंदुओ की उमायाद विजय के कारण 9 वीं शताब्दी तक शतरंज यूरोप पहुंचे 




भारत की खोज किसने और कब की थी ?


भारत की खोज वास्को डी गामा ने 20 मई 1498 ईस्वी को की थी वास्को डी गामा के जहाज का नाम सैन गेब्रियल और साओ राफयल था जिसके जरिए हुए भारत आए थे। वास्कोडिगमा ने भारत की खोज अपने चार नाविको के साथ मिलकर की थी। वह समुद्री मार्ग से भारत आया था। यूरोप से आसियावक समुद्री मार्ग को खोजने का श्रेय भी वास्कोडिगामा को जाता है साथ ही वास्कोडिगामा को डिस्कवरी ऑफ इंडिया भी कहा जाता था वास्कोडिगामा ने भारत की कूल तीन यात्रा की थी 1524 में उनकी अंतिम यात्रा हुई थी अंत में वह मलेरिया से गंभीर रूप से ग्रासित हो गए थे 24 दिसंबर 1524 को कोच्चि में उनका निथक हो गया



















हिमालय का जन्म कैसे हुआ ?

 

लगभग 200 मिलियन साल पहले भारत एक बड़ा द्वीप था, जोकि मेडागास्कर में स्थित था। ये एक सबकॉन्टिनेंट गोंडवानालैंड का हिस्सा था। यह प्राचीन (और अब विलुप्त) टेथिस महासागर के माध्यम से उत्तर की ओर बढ़ना शुरू हुआ। 10 मिलियन साल पहले यह दक्षिण एशिया के यूरेशियन प्लेट से टकराया।

 

जैसा कि दोनों महाद्वीपीय प्लेटें थीं और वे दब नहीं सकती थीं, इसलिए उन्होंने एक-दूसरे के खिलाफ धक्का दिया। यह प्रक्रिया केवल एक या दो दिन की नहीं थी, ये प्रक्रिया लगभग 10 मिलियन साल तक चलती रही।

 

जैसा कि इंडियन प्लेट ने अपने उत्तर की ओर धकेलना जारी रखा, निविकृत क्रस्ट(टीला) उच्च और उच्चतर तरीके से बाहर चला गया, अंततः एक पर्वत श्रृंखला के रूप में वर्गीकृत होने के लिए पर्याप्त उच्च हो गया और ऐसे हिमालय का निर्माण हुआ। उत्थान की यह प्रक्रिया आज भी चल रही है। हिमालय अभी भी बढ़ रहा।












 रावण ने अगर कैलास पर्वत को उठाने की कोशिश किया है , तो रावण क्यों नहीं उठा पाया हनुमान के गदा को ?

 

वाल्मीकि रामायण में हनुमान ने कभी गदा का इस्तेमाल नहीं किया, वे अपनी मुट्ठी से लड़ते थे और महाशिला , बड़े साला पेड़ और पर्वत शिखर का उपयोग करते थे। उन्होंने केवल उदाहरण के लिए पास में पड़े हथियारों का इस्तेमाल किया: उन्होंने रावण के बेटे, कुमार, जंबुमली, अक्षय कुमार के हजारों बेटों से लड़ने के लिए एक गेट के लोहे का एक बार का इस्तेमाल किया, उन्होंने रावण के एक और पुत्र त्रिशिर पर भी तलवार का इस्तेमाल किया।

हाँ, रावण ने कैलास पर्वत को उठा लिया, जिस पर भगवान शिव और मेरु और मंदरा जैसे अन्य पर्वत बैठे थे, लेकिन उसने कभी भी गदा उठाने का प्रयास नहीं किया और असफल नहीं रहा।

रावण केवल लक्ष्मण को उठाने में असफल रहा जब बाद में पता चला कि वह विष्णु का हिस्सा है लेकिन हनुमान ने लक्ष्मण को उठा लिया और रावण को एक लड़ाई में हराकर राम के पास ले गए। हनुमान शारीरिक रूप से रावण से ज्यादा मजबूत थे और रामायण के महाकाव्य में शारीरिक रूप से सबसे मजबूत थे

हनुमान पर रावण

"इससे पहले, मैंने वाली और सुग्रीव, एक महान जाम्बवान, सेना के चीफ निल और दविवि की महान कौशल वाले बंदरों को देखा है लईकिन उनसे मैं कभी भयभीत नहीं हुआ जैसा की इनसे हो रहा है ; उनकी प्रभावकारिता, ही उनका कौशल; तो उनकी बुद्धि, ही उनकी क्षमता या इच्छा शक्ति को बदलने की क्षमता।

इंद्रजीत को हनुमान का वर्णन करते हुए रावण

हे वीर! सेनाएं आपकी रक्षा नहीं कर सकती हैं, भले ही वे बहुत बड़ी तादाद में हों। बंदर के खिलाफ एक मजबूत बिजली की तरह एक हथियार लेने का कोई फायदा नहीं

पवन-देवता के पुत्र हनुमा की ताकत की कोई सीमा नहीं है। उसे मारना संभव नहीं है, जो किसी भी हथियार के लिए आग जैसा दिखता है।

वायु के पुत्र की जय हो।





पिप्पलाद ऋषि कौन थे ? पिप्पलाद ऋषि का शनिदेव से क्या संबंध है ?

 

श्मशान में जब महर्षि दधीचि के मांसपिंड का दाह संस्कार हो रहा था तो उनकी पत्नी अपने पति का वियोग सहन नहीं कर पायीं और पास में ही स्थित विशाल पीपल वृक्ष के कोटर में 3 वर्ष के बालक को रख स्वयम् चिता में बैठकर सती हो गयीं। इस प्रकार महर्षि दधीचि और उनकी पत्नी का बलिदान हो गया किन्तु पीपल के कोटर में रखा बालक भूख प्यास से तड़प तड़प कर चिल्लाने लगा।

जब कोई वस्तु नहीं मिली तो कोटर में गिरे पीपल के गोदों(फल) को खाकर बड़ा होने लगा। कालान्तर में पीपल के पत्तों और फलों को खाकर बालक का जीवन येन केन प्रकारेण सुरक्षित रहा।

एक दिन देवर्षि नारद वहाँ से गुजरे। नारद ने पीपल के कोटर में बालक को देखकर उसका परिचय पूंछा-

नारद- बालक तुम कौन हो ?

बालक- यही तो मैं भी जानना चाहता हूँ

नारद- तुम्हारे जनक कौन हैं ?

बालक- यही तो मैं जानना चाहता हूँ

तब नारद ने ध्यान धर देखा।नारद ने आश्चर्यचकित हो बताया कि हे बालक ! तुम महान दानी महर्षि दधीचि के पुत्र हो। तुम्हारे पिता की अस्थियों का वज्र बनाकर ही देवताओं ने असुरों पर विजय पायी थी। नारद ने बताया कि तुम्हारे पिता दधीचि की मृत्यु मात्र 31 वर्ष की आयु में ही हो गयी थी।

बालक- मेरे पिता की अकाल मृत्यु का कारण क्या था ?

नारद- तुम्हारे पिता पर शनिदेव की महादशा थी।

बालक- मेरे ऊपर आयी विपत्ति का कारण क्या था ?

नारद- शनिदेव की महादशा।

इतना बताकर देवर्षि नारद ने पीपल के पत्तों और गोदों को खाकर जीने वाले बालक का नाम पिप्पलाद रखा और उसे दीक्षित किया।

नारद के जाने के बाद बालक पिप्पलाद ने नारद के बताए अनुसार ब्रह्मा जी की घोर तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया। ब्रह्मा जी ने जब बालक पिप्पलाद से वर मांगने को कहा तो पिप्पलाद ने अपनी दृष्टि मात्र से किसी भी वस्तु को जलाने की शक्ति माँगी।ब्रह्मा जी से वर मिलने पर सर्वप्रथम पिप्पलाद ने शनि देव का आह्वाहन कर अपने सम्मुख प्रस्तुत किया और सामने पाकर आँखे खोलकर भष्म करना शुरू कर दिया।शनिदेव सशरीर जलने लगे। ब्रह्मांड में कोलाहल मच गया। सूर्यपुत्र शनि की रक्षा में सारे देव विफल हो गए। सूर्य भी अपनी आंखों के सामने अपने पुत्र को जलता हुआ देखकर ब्रह्मा जी से बचाने हेतु विनय करने लगे।अन्ततः ब्रह्मा जी स्वयम् पिप्पलाद के सम्मुख पधारे और शनिदेव को छोड़ने की बात कही किन्तु पिप्पलाद तैयार नहीं हुए।ब्रह्मा जी ने एक के बदले दो वर मांगने की बात कही। तब पिप्पलाद ने खुश होकर निम्नवत दो वरदान मांगे-

1- जन्म से 5 वर्ष तक किसी भी बालक की कुंडली में शनि का स्थान नहीं होगा।जिससे कोई और बालक मेरे जैसा अनाथ हो।

2- मुझ अनाथ को शरण पीपल वृक्ष ने दी है। अतः जो भी व्यक्ति सूर्योदय के पूर्व पीपल वृक्ष पर जल चढ़ाएगा उसपर शनि की महादशा का असर नहीं होगा।

ब्रह्मा जी ने तथास्तु कह वरदान दिया।तब पिप्पलाद ने जलते हुए शनि को अपने ब्रह्मदण्ड से उनके पैरों पर आघात करके उन्हें मुक्त कर दिया जिससे शनिदेव के पैर क्षतिग्रस्त हो गए और वे पहले जैसी तेजी से चलने लायक नहीं रहे।अतः तभी से शनि "शनै:चरति : शनैश्चर:" अर्थात जो धीरे चलता है वही शनैश्चर है, कहलाये और शनि आग में जलने के कारण काली काया वाले अंग भंग रूप में हो गए। सम्प्रति शनि की काली मूर्ति और पीपल वृक्ष की पूजा का यही धार्मिक हेतु है।आगे चलकर पिप्पलाद ने प्रश्न उपनिषद की रचना की,जो आज भी ज्ञान का वृहद भंडार है 


















पढ़ाई करने का सबसे अच्छा नियम क्या है?

 

मैं यहां कोई आदर्श ज्ञान नहीं दूंगा मैं सिर्फ वही बताऊंगा जो मैं अनुसरण करता हूं इसका आउटकम भी काफी अच्छा आता है।

पढ़ाई आप तभी कर पाएंगे जब आप शारीरिक मानसिक रूप से स्वस्थ होंगे इसलिए सुबह जल्दी उठकर व्यायाम योगा जरूर करें।

रात में 6 घंटे की नींद अवश्य लें, किंतु इससे अधिक ना लें, विद्यार्थी जीवन में इतनी नींद पर्याप्त है (हालांकि मैं घंटे सोता हूं)

जो भी पहले पढा है उसे अवश्य दोहराएं, उसके बाद ही कुछ नया पढ़ें (रिवीजन करना बहुत आवश्यक है)

जो भी विषय या टॉपिक कठिन लगे उसे उसी समय थोड़ा अधिक समय देकर पढ़ें, किंतु उसे छोड़े ना।

किसी भी टॉपिक या विषय को रटने की वजाय समझने पर ध्यान लगाएं, समझने से चीजें अधिक समय तक दिमाग में मौजूद रहती हैं।

एक विषय को लंबे समय तक ना पड़े, इससे नीरसता सकती है, आप प्रत्येक 1 घंटे में अपना विषय बदल सकते हैं।

बीच-बीच में कुछ समय का ब्रेक अवश्य लें (किंतु इस दौरान मोबाइल जैसी डिवाइस से दूर रहें)

पढ़ाई के दौरान नीरसता सकती है या डिमोटिवेट महसूस कर सकते हैं (जैसा कि मैं कभी-कभी करता हूं) उस वक्त थोड़ा रुक जाएं और 5-10 मिनट गहरी-गहरी सांस लें।

मोटिवेशनल वीडियो देखने की बजाय कुछ स्थाई मोटिवेशन लें, जैसे अपनी आर्थिक स्थिति या माता-पिता के सपने या अपने किसी खास को पाने हेतु अथवा कुछ भी जो स्थाई हो आपके जीवन में।

पढ़ाई के दौरान नकारात्मकता आना स्वाभाविक है इसलिए यह सोचना कि यह सिर्फ आपके साथ होता है यह गलत है, यह सभी के साथ होता है।

आप अपने खानपान पर अच्छे से ध्यान दें। लंबे समय तक बैठने पर आपको स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हो सकती हैं (सामान्यतः पेट और कब्ज से जुड़ी समस्याएं)

मैं नीम गिलोय जूस रोज सुबह पीता हूं (चाहें तो आप भी पी सकते हैं यह पेट के लिए फायदेमंद होता है)

मेरा एक दोस्त है जो देर रात तक पड़ता है तथा सुबह 9:00 बजे उठता है और सब कुछ अच्छे से व्यवस्थित कर लेता है (आप भी देर रात तक पढ़ सकते हैं तो पढ़ें, बस मन लगाकर पढ़ाई करें, जब भी मन लगे) हालांकि मैं ऐसा नहीं करता हूं ना ही मुझे ऐसा पसंद है,

किसी भी परीक्षा को अपनी पूरी जिंदगी मानने की गलती कभी ना करें, यदि असफल हुए तो जिंदगी नीरस लगने लगेगी।

सब कुछ हमारे जीवन का हिस्सा ही है जीवन नहीं है।

सबसे कीमती हमारा जीवन है, मन लगाकर पढ़ें, हमेशा रिलैक्स रहें ज्यादा तनाव ना लें, चिंता बिल्कुल ना करें सिर्फ चिंतन करें, जीवन में बहुत कुछ है करने को, जीवनसिर्फ एक यात्रा है अच्छे से पूरी करें, सब कुछ धीरे-धीरे मिल ही जाता है।




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