* चिड़िया घर में
इस भीड़ भरी दुनिया में जहां जंगल और वीरान इलाके तेजी से समाप्त होते जा रहे हैं। अनेक पशु पक्षियों को भोजन और विश्राम की जगह ढूंढने में कठिनाई बढ़ती जा रही है। पशु पक्षी की कुछ जातियां समाप्त हो चुकी हैं। जो बच्चे हैं उनको अक्सर चिड़ीयाघर में शरण मिलती है। चिड़िया घर का काम वन्य प्राणियों का संरक्षण नहीं है। असल में यह बहुत से पशुओं के लिए एक बड़े होटल की तरह होते हैं। वन प्राणियो को सबसे अच्छा संरक्षण पशु पक्षी विहार ओं में मिलता है। चिड़िया घर का काम इतना ही है कि वह पशुओं को मनुष्यो के संपर्क में लाता है। ताकि हम भिन्न-भिन्न स्थानों से आए और पक्षियों की सुंदरता को निकट से देख सके और उनके रहन-सहन के मनमोहक ढंग से आनंद प्राप्त कर सके। किंतु दिल्ली में रहने वाले कोई भी बच्चा चिड़ियाघर या इस जानवरों को देख सकता है। जैगुआर नामक टी तैयार रंग-बिरंगे मकाउ को देखने के लिए यात्रा नहीं कर सकते हैं, किंतु दिल्ली अहमदाबाद जयपुर लखनऊ मुंबई जैसे शहरों में रहने वाला कोई भी व्यक्ति चिड़ियाघर में इन आकर्षक जानवरों को देख सकते हैं। आखिर बहू भी तो मनुष्य की तरह सुख दुख का अनुभव करते हैं, इसके करो न दृश्य और क्या हो सकता है, जंगल का आजाद प्राणी इतने छोटे पिंजरे में बंद हो जाए कि आसानी से हिंल डुल भी ना सके।
दिल्ली का चिड़ियाघर एशिया का सबसे बड़ा चिड़ियाघर है। दुनिया के सबसे बड़े चिड़िया घरों में इसकी गिनती होती है। इसमें पक्षियों की बस्ती के लिए काफी पानी हिरणों के लिए खुला बगीचा शेरों के लिए गुफाएं और सीता के लिए पेड़ और जहां पिंजरो की जरूरत है वहां बड़े-बड़े साफ-सुथरे पिंजरे हैं। यह एक आदर्श चिड़ियाघर है जिसकी तुलना एक अच्छे होटल से की जा सकती है। सच बात तो यह है कि पक्षियों की बस्ती के कुछ निवासी तू अपनी इच्छा से यहां आकर बस गए हैं।
पशुओं के बारे में जानने का सबसे अच्छा तरीका उन्हें ध्यान से देखना। मेरी यह पुस्तक चिड़ियाघर में पाए जाने वाले हैं कुछ पशुओं को तुम्हारा परिचय भार करा सकती है। इनमें से कुछ तो बहुत प्रसिद्ध हैं, जैसे शेर और हाथी। कुछ पशु तुम्हारे लिए अजनबी भी हो सकते हैं जैसे मेंड्रिल और जेब्रा।।। हां सभी पशुओं का परिचय देना इस पुस्तक में संभव नहीं है।। लेकिन दुनिया में सब पशुओ का वर्णन करने के लिए तो बड़ा मोटा ग्रंथ लिखना होगा जो एक बहुत अच्छी बात होगी, जब दुनिया के सारे पशुओं को एक छोटी सी सूची मैं रखा जा सकेगा।।।।।।
1 चमर घेंघ सारस
भारत के किसी गांव में या उसके निकट कभी रहे हो तो तुमने लंबी लंबी टांगों से पानी में चलने वाला चमर घेंघ सारस को जरूर देखा होगा, जिसे गांव के आसपास खुले जल वाले भाग बहुत पसंद है चमर घेंघ के।। इसे अंग्रेजी में इडजुटेंट कहते हैं, जिसका अर्थ है सेना का अधिकारी। यह नाम इसलिए दिया गया है कि इसकी चाल अकड़कर परेड करते हुए सैनिक जैसी होती है।।।
सुंदर लहरदार पंख बड़े आकार का नंगा सीर लंबी टांगे इन सबसे या पक्षी काफी सुंदर और सैनिक अधिकारी के पद के योग्य लगता है।। इसकी सोच बड़ी मजबूत होती है जिससे यह खरगोश जैसे पशु और मुर्गे जितने पक्षी को निगल सकता है। इस सारस को बड़ी आसानी से पालतू बनाया जा सकता है। मेरे दादा के पास अनेक पालतू पशु थे, उनमें एक चमर घेंघ सारस भी था।।। उसकी आदत थी कि वह भोजन के समय दादा की कुर्सी के पीछे खड़ा हो जाता था और वही खड़े होकर भोजन करता था।।।
सारस पक्षी को बदसूरत पक्षी भी कहा है। इसका कारण है कि इसकी लंबी चोंच और गर्दन से लटकती लंबि थैली।। लेकिन सुंदरता के संबंध में लोगों विचार अलग-अलग होते हैं और मैं उन लोगों में ही हूं।। इसका एक या गुनया है कि वह शांत पक्षी है उसमें आवाज पैदा करने वाली स्नायु यू नहीं होते हैं। वह केवल जबरू से किटकिटाना की आवाज है निकाल सकता है। जब यह अपने साथी के लिए बेचैन होता है तू धीमी घुरघटाहट की आवाज निकाल सकता है।
चमर घेंघ पानी वाले जगहों में सारे भारत में पाया जाता है।। यदि आप शहर में रहते हैं तो बहुत संभव है कि आप उसे चिड़ियाघर मैया पक्षियों की बस्ती में देखे होंगे।। यहां पर आप उसके संबंधित चमचा चोंच से भी मिल सकते हैं।। गेम पक्ष ही इतना बड़ा तो नहीं होता लेकिन अपनी चमक जैसी चौड़ी काली चोंच से जल जीवो को बड़ी आसानी से पकड़ सकता है।
2 कालाहिरण या भारतीय मृग
100 साल पहले पंजाब, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में हजारों काले हिरणों का झुंड आम दिखाई देता था। आज 20-30 हिरनो का झुंड भी बिरले ही दिखाई देता है। जहां खेती बाड़ी होती है, चूंकि यह फसलों में इनका स्वागत नहीं होगा।
काले हिरणों में नर हिरण के ही सींग होते हैं।।ये सींग चिंकारा या भारतीय कल पूछ के सींगो से काफी बड़े होते हैं।।और आमतौर पर ये दो फूल से भी अधिक लंबे होते हैं।
ये सीधे उधर की बड़ते हैं।।और फिर पेंच खाते हुई मुंड जाते हैं।।काले हिरण के सुंदर सींग और आंखों को लुभानेवाला रंग होता है की कोई अन्य हिरण उसकी बराबरी नहीं कर सकता।
अन्य हिरणों की तरह काला हिरण भी जुगाली करता है। पहले वह घास या दूसरे भोजन को बिना चबाए निगल जाता है और बाद में उसे मुंह में गूगल कर धीरे-धीरे चलाता है। उसके
चबाने वाले दांत अनाज पीसने की चक्की की तरह होते हैं। इस तरह भोजन करने वाले सभी पशुओं को रोमन थी या जुगाली करने वाले पशु कहते हैं। इन पशुओं के पास बचाव करने का उपाय नहीं है, खूंखार जानवरों के खतरे के कारण लंबे समय तक एक जगह पर नहीं टिक सकते।। इसीलिए वे ज्यादा से ज्यादा घास जल्दी खा लेते हैं और फिर कहीं सुरक्षित स्थान पर बैठ कर आराम से उसे दोबारा चलाते हैं।।
3 चिंपेंजी
यह इतना सा ध्यान है कि शायद जानवरों में गिना जाना भी उसे अच्छा नहीं लगेगा। मनुष्य मिलते-जुलते जितने भी पशु इस धरती पर जीवित बचे हैं, उनमें उनमें मनुष्य से सबसे अधिक समानता चिंपेंजी में ही है। बहुत सभ्य हैं वह लेखक से भी यह काहना चाहे, यदि तुम मुझे
चिड़ियाघर में रखना चाहते हो तो तुम्हें भी उसमें रहना चाहिए।" इसमें कोई संदेह नहीं है कि चिंपैंजी मनुष्य के बीच रहना चाहता है। वह हमेशा जंगल में प्रसिद्ध नायक टार्जन के साथ रहता है। सच बात तो यह है कि टार्जन की फिल्मों में काम करने वाले चिंपेंजी अपना पाठ याद करने में कभी-कभी टार्जन का काम करने वाले सुपरमैन को भीम मात देते हैं। चिंपेंजी की आयु उतनी ही होती है, जितनी कि मनुष्य की होती है, इस प्रकार 9 वर्ष a चिंपेंजी 9 वर्ष के बालक के लिए आदर्श साथी होगा और दोनों में बहुत समानता होती है।।
जेराल्ड डरेल नामक लेखक जो सारे विश्व के चिड़िया घरों के लिए जानवरों को इकट्ठा करता था अपने साथ एक चिंपेंजी रखा करता था। यह चिंपेंजी चाय पीते समय, भोजन करते समय और भोजन के बाद सिगरेट पीते समय उसके साथ देता था। चिंपांजी बड़े आत्मविश्वास के साथ धूम का कश लेता था और फिर नाक से धुआं छोड़ता था। चिंपेंजी को सर्दी अच्छी नहीं लगती और वह जल्दी से कपड़ों की जरूरत को समझने लगता था। एक चिकन दीपेन जी को नए कपड़ों को इतनी प्रशंसा प्रशंसा होती थी , कि जब कभी उसे नई पोशाक दी जाती थी, वह पुरानी पोशाक को फाड़ डालता था ताकि उसे दोबारा ना पहननी न पड़े। अजीब बात तो यह है कि चिंपेंजी वन्य अवस्था में भी चोटियों पर रहने की वजह जमीन पर रहना ज्यादा पसंद करता था। कुछ लोग सोचेंगे कि इस तरह तो वह तेंदुए को आसानी से शिकार बन जाता होगा (बंदर जाति को तेंदुआ का बड़ा भय होता है) लेकिन यह बंदर अधिक संख्या के कारण सुरक्षित रहते हैं। अपनी लंबी मजबूत वहां बाहों बड़े-बड़े हाथ और पैरों के साथ चिंपेंजी आश्चर्यजनक रूप से बलवान भी होते हैं। उनका असली घर पश्चिमी अफ्रीका है, किंतु यदि उन्हें संयुक्त राष्ट्र संघ एक सीट दे दी जाए तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी।।।
चिंपेंजी
4 काकातुआ
यदि इनके रहने की जगह बहुत टाग ना हो तो एक पक्षी फालतू बढ़ने पर खूब फलते फूलते हैं। ऑस्ट्रेलिया से आते हैं। इनका रंग बर्फ की तरह सफेद होता है और सिर पर कलगी होती है। कुछ सदा साधारण सफेद होते हैं , जिस के गाल सीने और पंखों के नीचे के भागो पर गुलाबी रंग की झाई होती है, और चमकीली धारी धर लाल पीले कलगी होती है। काला कलातुआ स्लेटी काला होता है।। उसके गाल ज़र्द लाल और लंबे काले पंख की कलगी होती है।
काकातुआ अनेक प्रकार से हमारे मनोरंजन करता है वह उठ पटांग हरकतें करता है। उसे लोगों का ध्यान लगाकर उसकी और देखना और प्रशंसा करना बहुत अच्छा लगता है। उसे बार-बार अपना नाम बताने का भी बड़ा शौक है। यदि आप उसकी बातों की और ध्यान नहीं देंगे तो वह दिखने लग जाएगा।
सुग्गा जाति के और पक्षियों की तरह काला तू आ को भी अपने जांच को पैनी बनाने में आनंद आता है। उसे जो भी लकड़ी का टुकड़ा मिलता है उससे कुतर डालता है। उसकी चोंच बहुत मजबूत होती है, लेकिन वह जान पहचान वाले व्यक्ति को हाथों और मुंह पर उससे बिना कोई कष्ट पहुंचाया जा सकता है। लेकिन जिस आदमी को वह जानता नहीं है, उसकी उंगलियों का स्पर्श उसे पसंद नही है। इसीलिए उसके पिंजरे में कभी हाथ ना डालिए गा, नहीं तो वह उंगलियों को बुरी तरह से काट डालेगा। मेरे दादा के पास एक ऐसा काकातुआ था जो परिवार के सब लोगों को पहचानता था और उनको सही नाम लेकर भी पुकार सकता था। इस दृष्टि से एक काका तूआ है हमारे उन सोतों से ज्यादा अकलमंद हैं जो हर किसी को गंगाराम ही पुकारते हैं।
5. मगरमच्छ
क्या आपने मगरमच्छ को चेहरे पर बिक्री मुस्कान को ध्यान से देखा ? यह मुस्कान हमेशा बनी रहती है केवल उस समय को छोड़कर जब वह अपने भोजन निगलने के लिए अपने बड़े-बड़े जबड़े को खोलता है। यह उस समय भी मुस्कुराता हुआ दिखता है, उस समय भी मुस्कुराता हुआ दिखता है जब वह अपने शिकार को भयानक पूछ मारकर अपने जब बड़ों के पास ले आता है।
चिड़ियाघर का मगर बड़ा सुस्त दिखाई देता है। वैसे वह हमेशा सुस्त दिखता है स्वतंत्र जीवन में भी उसकी यही आदत होती है। नदी के किनारे वह चुपचाप पड़ा रहता है और पुराने पेड़ के तने जैसे लगता है। मगरमच्छ को ताजे मांस की अपेक्षा सड़ा हुआ मांस ज्यादा अच्छा लगता है। आमतौर पर वह अपने शिकार को कहें गाड़ देता है जब वह काफी बदबूदार हो जाता है। इस तरह की कई कहानियां सुनने को मिलती है की इनके चंगुल में फंसे आम दिनों को मुसीबत से निकलने के लिए मृत्यु होने का बहाना किया ताकि मगरमच्छ उन्हें कहीं दबा दें और वह मौका पाकर अपने कब्र से निकल भागे।
गंगा नदी के मजदूरों को घड्याल कहते हैं। घटिया लोका लंबा पतला होता है, जिसकी सहायता से ये सीर को इधर-उधर चलाकर मछलियों को पकड़ते हैं। अफ्रीकी मगरमच्छ या नील के मगरमच्छ सबसे अधिक संख्या में पाए जाते हैं ,किंतु यह मगरमच्छ भी अब बहुत काम हो गए हैं,
6. हाथी
हाथी के बिना चिड़ियाघर अधूरा ही रहेगा यदि हम भारत में जयपुरिया मैसूर की सड़कों पर अक्सर हाथी देखा करते हैं। हाथी सब को अच्छा लगता है आप कहीं भी इसको बारे में बुराई नहीं सुने होंगे। और भारी भरकर पशुओं में शक्ति और कोमलता का बच्चों किसी रूठने की आदत और विनोदी स्वभाव का भारी वजन और नर्तक के सामने के पैरों के नाजुक संतुलन का मेल होता है। हाथी हिंदू और बौद्ध लोक कथाओं का पीली पात्र है और सब जगह उसे बहुत प्यार किया जाता है । वैसे किसी और वस्तु को नसीब नहीं होते जैसे - मोती,कमाल ,काला नाग , सुनहरी आदि।
इन पशुओं का इतना आदर क्यों किया जाता है इसके कारण को पता आसानी से लगाया जा सकता है, हाथी बहुत समझदार परिश्रमी और आज्ञाकारी होते हैं। वे आदमी को पसंद करते हैं और शीघ्र ही उनके तौर-तरीके के अनुसार अपने को ढाल लेते हैं। "यह बात भारतीय हाथी की बारे में ही कहीं जा सकती है"का उसके सुंदर दांतो के के कारण बड़ी निर्दयता बदला प्यार से चुकाते हैं। वह बहुत फुर्तीला और ताकतवर होते हैं ।और देखने में तो शानदार भी होते हैं। भारत में जंगली हाथी अब भी पाए जाते हैं किंतु अधिकतर हाथियों को अब पालतू पशु ही कहा जाता है। जंगली हाथियों को पालतू हाथी घेर कर लाते हैं, और क्योंकि यह भी अपने संबंधियों को सभ्य बनाने के लिए शीघ्र ही प्रभावित कर लेते हैं। लेकिन हाथी कैसा व्यवहार करेगा, इसका पहले से अनुमान नहीं लगाया जा सकता है कि मैंने एक ऐसे फालतू हाथी को देखा है।। हाथी किशोर सबसे ज्यादा चर्चा की योग्य है। यस और हाथी की लंबी नाक है, और यदि आप इसे ध्यान से देखेंगे तो उसमें सबसे आगे दो नाक दिखाई देते है।।मैने तो एक घिरे हुई ग्रामीणवासियों को बचाया था और एक अन्य अवसर पर उसी हाथी ने गुस्से में आकर गांव के डाकघर को तोड़ फोड़ दिया था।।।
हाथियों गोपाल ना बहुत खर्चीला काम है यदि प्राचीन काल में केवल राजा है अपने के लिए हाथी रख रहा था। राजा इन हाथियों को देखभाल के लिए बहुत से नौकर रखते थे। इसलिए यह कहावत चल पड़ेगी हाथी के पांव में अनेक पांव होते हैं।। समारोह के अवसरों पर (जैसे गणतंत्र दिवस की परेड पर हाथी को अवधि में सजाया जाता है) महावत को लेट आता है और फिर उसे बच्चे की तरह नहलाया लाया जाता है महावत की आज्ञा के अनुसार वह कभी अपना सिर उठाता है कभी टांग उधर महावत को छोटा लड़का हाथी की भारी भरकर शरीर पर चढ़ जाता है और उसे इट से रगड़ता है। हाथी कभी-कभी साबुन की पानी से खेल लगता है और उसे सोने में भरकर बुलबुले छोड़ता है। नहाने के बाद उसे सजाया जाता है। सबसे पहले मस्तक सूंड और कानों पर रंगों की आकृति बनाई जाती है कुछ महावत इस काम में बहुत निपुण होते हैं।
इस सारी तैयारी कर तैयारी के दौरान हाथी बड़े धैर्य का परिचय देता है किंतु कभी-कभी सारी तैयारी के बाद वह कुछ भी शरारत भी कर देता है ।और आसपास से एक कुछ पत्ते और घास फूस उठाकर अपनी पीठ पर डाल लेता है ताकि परेड शुरू होने से पहले महावत को कुछ भी और परिश्रम करना पड़े। हाथी की सूंड सबसे ज्यादा चर्चा के योग्य है । यह सूंड हाथी की लंबी नाक है। अबे ध्यान से देखोगे तो हाथी के दो आगे छेद होते हैं और जो आपकी नाक के छेद हो या किसी भी पशु को भूतनी के छेद जैसे होते हैं।। जिस तरह हम अपने नाक से सांस लेते हैं उसी तरह हाथी अपनी सूंड से सांस लेते हैं। लेकिन नाक का काम करने के साथ-साथ हाथी की सूंड हाथ का काम भी करता है। इसकी सहायता से हाथी जमीन पर पड़ी चीजों को उठा लेता है। और पेड़ों से पत्ते तोड़ सकता है हाथी सूट में पानी भी भर लेता है, और सूट से पानी भी पी सकता है पी लेता है, जिससे पानी सूट में भर जाता है सूट के अगले भाग को पानी में डूबा कर सांस लेता है। इसके बाद वह छोड़ को इस तरह मुड़ता है कि और इसके मुंह के पास आ जाता है जब वह सांस छोड़ता है तो रोड में पानी मुंह में चला जाता है।
सचमुच हाथी सूंड एक अजूबा है।।।।
जिराफ
यह सुंदर पशु बाजार स्थिति में केवल अफ्रीका में पाया जाता है । इसे यूरोप में पहली बार तब देखा गया था, जब महान रोमन सम्राट जूलियस सीजन ऐसा पूर्व 102.44 उससे रोम केस सर्कस में दिखाया गया था। इससे पूर्व की पांचवी शताब्दी मैं रूम के पतन के बाद 18 सो 27 ईस्वी तक यूरोप में जीवित जीरा नहीं ले जाया गया उसके बाद मिस्र के पास आ ने एक जिराफ इंग्लैंड को और एक फ्रांस को दिया।
तब से अनेक जिराफ अफ्रीका से लाए गए हैं और संसार को चिड़िया घरों में रखे गए हैं। धरती पर रहने वाले सभी प्राणियों में जिराफ सबसे ऊंचा होता है। पूरी जवानी में या 16 या 17 फुट ऊंचा हो जाता है और अपनी लंबी गर्दन से वह उसे पेड़ों की चोटियों पर पहुंच जाता है। इसके जीव की लंबी और पतली होती है और इससे यह पेड़ों की दाल पतियों को अपने मुंह की तरफ खींच सकता है।
जिराफ की चाल बड़ी अटपटी लगती है क्योंकि वह एक ओर से दोनों टांगो को एक साथ उठाता है इसकी आंखें बड़ी बड़ी और चिकारा की आंखों से भी अधिक सुंदर होती है जिराफ बहुत दूर तक देख सकता है और उसकी की सूंघने की शक्ति बड़ी तेज होती है। यदि हवा की दिशा उसकी ओर हो तो यह बहुत दूरी तक पर ही आदमी को पता लगा लेता है इसीलिए पूरे जवान जिराफ को पकड़ना बहुत कठिन होता है ऊंचाई के कारण उसको 1 स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना बहुत कठिन होता है।। चिड़िया घरों में पाए जाने वाले जिराफ छोटी उम्र में पकड़े गए होते हैं और वह चिड़िया घरों में ही बड़े होते हैं जहां उन्हें मक्का ,अनाज ,गाजर ,और घास पर पाला जाता है।
जिराफ शब्द अरबी भाषा से आया है। यहां इसका अर्थ लंबी गर्दन वाला होता है।
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