22 अप्रैल
2 . वातावरण में ऑक्सीजन गैस का प्रतिशत है:
78%
3. विश्नोई आन्दोलन से जुड़ा था?
अमृता देवी
4. चिपको आन्दोलन का संबध किस राज्य से है?
उतराखंड
5. सरदार सरोवर बंध किस राज्य में स्थित है?
गुजरात
6. चम्पारण सत्याग्रह कब प्रारम्भ हुआ था?
10 April 1917
7. बारदोली सत्याग्रह का नेतृत्व किसने किया था?
सरदार वल्लभ भाई पटेल
8. झारखण्ड में सर्वाधिक जनसंख्या किस जनजाति की है?
संथाल
9. क्षेत्रफल की दृष्टि से झारखंड का सर्वाधिक वनाच्छादन वाला जिला कौन-सा है?
पश्चिमी सिंहभूम
10. 1889-1900 ई. के मुंडा विद्रोह का नेता कौन था?
बिरसा मुंडा
11. नर्मदा बचाओ आन्दोलन पर एक टिप्पणी लिखें|
- नर्मदा बचाओ आंदोलन एक बार और मेरे भारत में चल रहे पर्यावरण आंदोलनों की परिपक्वता का उदाहरण है।[1][2] इसने पहली बार पर्यावरण तथा विकास के संघर्ष को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनाया जिसमें न केवल विस्थापित लोगों बल्कि वैज्ञानिकों, गैर सरकारी संगठनों तथा आम जनता की भी भागीदारी रही। नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर बांध परियोजना का उद्घाटन 1961 में पंडित जवाहर लाल नेहरू ने किया था। लेकिन तीन राज्यों-गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र तथा राजस्थान के मध्य एक उपयुक्त जल वितरण नीति पर कोई सहमति नहीं बन पायी। 1969 में, सरकार ने नर्मदा जल विवाद न्यायधिकरण का गठन किया ताकि जल संबंधी विवाद का हल करके परियोजना का कार्य शुरु किया जा सके। 1979 में न्यायधिकरण सर्वसम्मति पर पहुँचा तथा नर्मदा घाटी परियोजना ने जन्म लिया जिसमें नर्मदा नदी तथा उसकी 41 नदियों पर दो विशाल बांधों - गुजरात में सरदार सरोवर बांध तथा मध्य प्रदेश में नर्मदा सागर बांध, 28 मध्यम बांध तथा 3000 जल परियोजनाओं का निर्माण शामिल था। 1985 में इस परियोजना के लिए विश्व बैंक ने 450 करोड़ डॉलर का लोन देने की घोषणा की सरकार के अनुसार इस परियोजना से मध्य प्रदेश, गुजरात तथा राजस्थान के सूखा ग्रस्त क्षेत्रों की 2.27 करोड़ हेक्टेयर भूमि को सिंचाई के लिए जल मिलेगा, बिजली का निर्माण होगा, पीने के लिए जल मिलेगा तथा क्षेत्र में बाढ़ को रोका जा सकेगा। नर्मदा परियोजना ने एक गंभीर विवाद को जन्म दिया है। एक ओर इस परियोजना को समृद्धि तथा विकास का सूचक माना जा रहा है जिसके परिणाम स्वरूप सिंचाई, पेयजल की आपूर्ति, बाढ़ पर नियंत्रण, रोजगार के नये अवसर, बिजली तथा सूखे से बचाव आदि लाभों को प्राप्त करने की बात की जा रही है वहीं दूसरी ओर अनुमान है कि इससे तीन राज्यों की 37000 हेक्टेयर भूमि जलमग्न हो जाएगी जिसमें 13000 हेक्टेयर वन भूमि है। यह भी अनुमान है कि इससे 248 गांव के एक लाख से अधिक लोग विस्थापित होंगे। जिनमें 58 प्रतिशत लोग आदिवासी क्षेत्र के हैं। अतः प्रभावित गाँवों के करीब ढाई लाख लोगों के पुनर्वास का मुद्दा सबसे पहले स्थानीय कार्यकर्ताओं ने उठाया । इन गतिविधियों को एक आंदोलन की शक्ल 1988-89 के दौरान मिली जब के स्थानीय स्वयमसेवी संगठनों ने खुद को नर्मदा बचाओ आंदोलन के रूप में गठित
12. ‘ध्वनी प्रदुषण’ पर एक संक्षिप्त टिप्पणी
लिखे|ध्वनि प्रदूषण किसी भी प्रकार के अनुपयोगी ध्वनियों को कहते हैं, जिससे मानव और जीव-जन्तुओं को परेशानी होती है। इसमें यातायात के दौरान उत्पन्न होने वाला शोर मुख्य कारण है। जनसंख्या और विकास के साथ ही यातायात और वाहनों की संख्या में भी वृद्धि होती जिसके कारण यातायात के दौरान होने वाला ध्वनि प्रदूषण भी बढ़ने लगता है। अत्यधिक शोर से सुनने की शक्ति भी चले जाने का खतरा होता है।
ध्वनि के स्रोत
दुनिया भर में सबसे ज्यादा शोर के स्रोत परिवहन बंदरगाह, मोटर वाहन का किनारा है, तट में वैमानिक शोर-शराबा और (विमान का शोर) रेल से होने वाला शोर भी शामिल है। स्थापित किया गया है, क्योंकि इसके साथ-साथ औद्योगिक और आवासीय आवासीय क्षेत्र में ध्वनि प्रदूषण का कारण बन सकते हैं। अमेरिकी परिवहन शहरी विभाग (शहरी गाजियाबाद) आवाजाचे प्रदूषण, त्सेच औद्योगिक और आवासीय भवन, निवासी भागात ध्वनि प्रदूषण वाढवु शकते। कारण होउ शक्ते. अन्य आपदाओं में कार्यालय के उपकरण, रोबोटिक मनोरंजन प्रणाली, निर्माण कार्य, उपकरण, बिजली के उपकरण, प्रकाश व्यवस्था (लाइटिंग) गुणगान एवं दर्शक मनोरंजन प्रणाली आते हैं। आईटीआर स्रोत में ऑफिस उपकरण, फैक्ट्री मशीनरी, बांधकाम कार्य, उपकरण, पावर टूल्स, लाइटिंग (एन लाइटिंग लाइटिंग) और संगीत मनोरंजन प्रणाली समाविष्ट है
प्राचीन भारतीय दार्शनिकों के अनुसार मनुष्य को एक बुद्धिमान प्राणी होने के नाते पर्यावरण की सुरक्षा करना मौलिक कर्तव्यों में से एक होना चाहिए। वेद, उपनिषद, पुराण और अन्य ग्रंथ पेड़-पौधों और वन्य जीवन के साथ-साथ समुदाय के लिए उनके महत्व का विस्तृत विवरण देते हैं।
यजुर्वेद में कहा गया है कि वृक्षों को ना काटो । जल और पृथ्वी की रक्षा करना धर्म है। यह भूमि, माता के समान सबकी पोषक है और में पुत्र के समान इस भूमिका रक्षक हूँ। भारत में पौधों का लोक महत्त्व भी है इस कारण भी पर्यावरण संरक्षण की भावना रही है भारतीय संविधान में भी पर्यावरण संरक्षण हेतु कानूनों का उल्लेख है।
वनों के प्रमुख उपयोग एवं वन-विनाश के कारण व समस्याएं
वनों के कुछ प्रमुख उपयोग एवं वन-विनाश के कारण व समस्याएं निम्न हैं-
1. घरेलू एवं व्यापारिक उद्देश्यों की पूर्ति तथा उत्पन्न समस्याएं- लकड़ी की प्राप्ति के लिए पेड़ों की कटाई वनों के विनाश का वास्तविक कारण है। तेजी से बढ़ती जनसंख्या, औद्योगिक एवं नगरीकरण में तीव्र वृद्धि के कारण लकड़ी की मांग मे दिनों-दिन वृद्धि हो रही है। परिणामस्वरूप वृक्षों की कटाई में भी निरंतर वृद्धि हो रही है। भूमध्यरेखीय सदाबहार वनों का प्रतिवर्ष 20 मिलियन हेक्टेयर की दर से सफाया हो रहा है। इस शताब्दी के आरंभ से ही वनों की कटाई इतनी तेज गति से हुई है कि अनेक पर्यावरणीय समस्याएं पैदा हो गई हैं। आर्थिक लाभ के नशे में धुत्त लोभी भौतिकतावादी आर्थिक मानव यह भी भूल गया कि वनों के व्यापक विनाश से उसका ही अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। विकासशील एवं अविकसित देशों में ग्रामीण जनता द्वारा नष्टप्रायः अवक्रमित वनों से पशुओं के लिए चारा एवं जलाने की लकड़ी का अधिक-से-अधिक संग्रह करने से बचा-खुचा वन भी नष्ट होता जा रहा है।
2. कृषि भूमि तैयार करना-
क. मुख्य रूप से विकासशील देशों में मानव-जनसंख्या मे तेजी से हो रही वृद्धि के कारण यह आवश्यक हो गया है कि वनों के विस्तृत क्षेत्रों को साफ करके उस पर कृषि की जाए, ताकि बढ़ती जनसंख्या का पेट भर सके। इस प्रवृत्ति के कारण सवाना घास प्रदेश का व्यापक स्तर पर विनाश हुआ है, क्योंकि सवाना वनस्पतियों को साफ करके विस्तृत क्षेत्र को कृषि क्षेत्र में बदला गया है।
ख. शीतोष्ण कटिबंधीय घास के क्षेत्रों (यथा- सोवियत रूस के स्टेपी, उत्तरी अमेरिका के प्रेयरी, दक्षिणी अमेरिका के पंवाज, दक्षिणी अफ्रीका के वेल्ड तथा न्यूजीलैंड के डाउंस) की घासों एवं वृक्षों को साफ करके उन्हें वृहद् कृषि प्रदेशों में बदलने का कार्य बहुत पहले ही पूर्ण हो चुका है।
ग. रूमसागरीय जलवायु वाले क्षेत्रों के वनों को बड़े पैमाने पर साफ करके उन्हें उद्यान, कृषि भूमि में बदला गया है। इसी तरह दक्षिणी एवं दक्षिणी-पूर्वी एशिया के मानसूनी क्षेत्रों में तेजी से बढ़ती जनसंख्या की भूख मिटाने के लिए कृषि-भूमि का विस्तार करने के लिए वन क्षेत्रों का बड़े पैमाने पर विनाश किया गया है।
3. अतिचारण- उष्ण तथा उपोष्ण कटिबंधीय एवं शुष्क तथा अर्द्ध-शुष्क प्रदेशों के सामान्य घनत्व वाले वनों में पशुओं को चराने से वनों का क्षय हुआ है तथा हो रहा है। ज्ञातव्य है कि इन क्षेत्रों के विकासशील एवं अविकसित देशों में दुधारू पशु विरल तथा खुले वनों में भूमि पर उगने वाली झाड़ियों, घासों तथा शाकीय पौधों को चटकर जाते हैं, साथ-ही-साथ ये अपने खुरों से भूमि को इतना रौंद देते हैं कि उगते पौधों का प्रस्फुटन नहीं हो पाता। अधिकांश देशों में भेड़ों के बड़े-बड़े झुंडों ने तो घासों का पूर्णतया सफाया ही कर दिया है।
. वनाग्नि-
क. प्राकृतिक कारणों से या मानव-जनित कारणों से वनों में आग लगने से वनों का तीव्र गति से तथा अल्प समय में विनाश होता है। वनाग्नि के प्राकृतिक स्रोतों में वायुमंडलीय बिजली सर्वाधिक प्रमुख है। मनुष्य भी जाने एवं अनजाने रूप में वनों में आग लगा देता है।
ख. मनुष्य कई उद्देश्यों से वनों को जलाता है- कृषि भूमि में विस्तार के लिए, झूमिंग कृषि के तहत कृषि कार्य के लिए घास की अच्छी फसल प्राप्त करने के लिए आदि। वनों में आग लगने का कारण वनस्पतियों के विनाश के अलावा भूमि कड़ी हो जाती है, परिणामस्वरूप वर्षा के जल जमीन में अंतः संचरण (Infiltration) बहुत कम होता है तथा धरातलीय वाही जल में अधिक वृद्धि हो जाती है, जिसके कारण मृदा-अपरदन में तेजी आ जाती है। वनों में आए दिन आग लगने से जमीन पर पत्तियों के ढेर नष्ट हो जाते हैं, जिसके कारण ह्यूमस तथा पोषक तत्वों की भारी कमी हो जाती है। कभी-कभी तो ये पूर्णतया नष्ट हो जाते हैं।
ग. वनों में आग के कारण मिट्टी, पौधों की जड़ों तथा पत्तियों के ढेरों में रहने वाले सूक्ष्म जीव मर जाते हैं। स्पष्ट है कि वनों में आग लगने या लगाने से न केवल प्राकृतिक वनस्पतियों का विनाश होता है तथा पौधों का पुनर्जनन अवरुद्ध हो जाता है, वरन् जीवीय समुदाय की भी भारी क्षति होती है, जिसके कारण पारिस्थितिकीय असंतुलन उत्पन्न हो जाता है।
5. वनों का चारागाहों में परिवर्तन- विश्व के रूमसागरीय जलवायु वाले क्षेत्रों एवं शीतोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों, खासकर उत्तरी एवं दक्षिणी अमेरिका तथा अफ्रीका में डेयरी फार्मिंग के विस्तार एवं विकास के लिए वनों को व्यापक स्तर पर पशुओं के लिए चारागाहों में बदला गया है।
6. बहुउद्देशीय नदी-घाटी परियोनजाओं के कार्यान्वयन के समय विस्तृत वन-विनाश- बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं के कार्यान्वयन के समय विस्तृत वन क्षेत्र का क्षय होता है, क्योंकि बांधों के पीछे निर्मित वृहत् जल-भंडारों में जल का संग्रह होने पर वनों से आच्छादित विस्तृत भू-भाग जलमग्न हो जाता है, जिस कारण न केवल प्राकृतिक वन संपदा समूल नष्ट हो जाती है, वरन् उस क्षेत्र का पारिस्थितिकी संतुलन ही बिगड़ जाता है।
7. स्थानांतरीय या झूमिंग कृषि (Shifting of Jhuming Cultivation)- झूमिंग कृषि दक्षिणी एवं दक्षिणी-पूर्वी एशिया के पहाड़ी क्षेत्रों में वनों के क्षय एवं विनाश का एक प्रमुख कारण कृषि की इस प्रथा के अंतर्गत पहाड़ी ढालों पर वनों को जलाकर भूमि को साफ किया जाता है। जब उस कृषि की उत्पादकता घट जाती है तो उसे छोड़ दिया जाता है।
15. ब्रिटिश शासनकाल में होने वाले प्रमुख कृषक आन्दोलनों का वर्णन करें|
अग्रेजी शासन ने किसानों के संघर्षों को दंगों और न्याय तथा कानून से संबंधित प्रशासनिक समस्या के रूप में देखा था। किसान आंदोलन वहीं उभरे जहां राष्ट्रीय आंदोलन की नींव पड़ चुकी थी उदाहरण के लिए केरल, पंजाब, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार ।उपनिवेशवाद के अधीन भारतीय कृषि व्यवस्था
अंग्रेजों द्वारा भारतीय कृषि व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन किये जाने से देश के कृषि जगत में हलचल पैदा हो गयी तथा भारतीय कृषक निर्धनता की बेड़ियों से जकड़ गये। उपनिवेशवाद के अधीन भारतीय कृषि की निर्धनता के निम्न प्रमुख कारण थे-
⇨ उपनिवेशवादी आर्थिक नीतियां।
⇨ भारतीय हस्तशिल्प के विनाश से भूमि पर अत्यधिक दबाव।
⇨ नयी भू-राजस्व व्यवस्था। तथा
⇨ उपनिवेशवादी प्रशासनिक एवं न्यायिक व्यवस्था।
भारतीय कृषक लगन की ऊँची दरों, अवैध करों, भेदभावपूर्ण बेदखली एवं जमीदारी क्षेत्रों में बेगार जैसी बुराइयों से त्रस्त थे। रैयतवाड़ी क्षेत्रों में सरकार ने स्वयं किसानों पर भारी कर आरोपित कर दिये। इन विभिन्न कठिनाइयों के बोझ से दबे किसान, अपनी जीविका के एकमात्र साधन को बचाने के लिये महाजनों से ऋण लेने हेतु विवश हो जाते थे। ये महाजन उन्हें अत्यंत ऊंची दरों पर ऋण देकर उन्हें ऋण के जाल में फांस लेते थे। अनेक अवसरों पर तो किसानों को अपनी भूमि एवं पशु भी गिरवी रखने पड़ते थे। कभी-कभी ये सूदखोर या महाजन किसानों की गिरवी रखी गयी सम्पति को भी जब्त कर लेते थे।
इन सभी कारणों से कृषक धीरे-धीरे निर्धन लगानदाता तथा मजदूर बन कर रह गये। बहुत से कृषकों ने कृषि कार्य छोड़ दिया, कृषि भूमि रिक्त पड़ी रहने लगी तथा कृषि उत्पादन कम होने लगा। यदा-कदा किसानों ने अपने अत्याचारों का विरोध भी किया तथा शीघ्र ही वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि उनका मुख्य शत्रु उपनिवेशवादी शासन है। कभी-कभी उत्पीड़न की पराकाष्ठा हो जाने पर किसानों ने आपराधिक कार्य भी किये। इन अपराधों में डकैती, लूट एवं हत्यायें जैसी घटनायें शामिल थीं।
16. स्वतंत्र भारत में विस्थापन की समस्या पर
निबंध लिखे|
भारत में विस्थापन की समस्या कोई नई नहीं है। 1947 में बंटवारे ने जो देश के बीच एक लकीर खींची थी, उसने लाखों लोगों को इधर से उधर अपने घरों को छोड़ कर जाने को मजबूर कर दिया था। तब से लेकर आज तक वजह अलग हो सकती है पर पलायन और विस्थापन की यह प्रक्रिया साल दर साल जारी है।
भारत में साल दर साल बढ़ रहे हैं विस्थापित
यदि हाल ही में इंटरनेशनल डिस्प्लेसमेंट मॉनिटरिंग सेंटर के आंकड़ों पर गौर करें तो देश में हर साल औसतन 36 लाख लोग विस्थापित होते हैं। यह आंकड़े 2008 से 2019 के औसत पर आधारित हैं। जबकि यदि 2019 के आंकड़ें देखें तो अकेले इसी वर्ष में करीब 50,37,000 नए विस्थापित सामने आये हैं। जबकि 2009में 53,37,000 लोग विस्थापित हुए थे। इन दोनों ही वर्षों में सबसे गौर करने वाली बात यह है कि भारत में ज्यादातर लोग आपदाओं के चलते विस्थापित हुए हैं। जहां आपदाओं के चलते 2019 में 50,18,000 लोग विस्थापित हुए थे, वहीं उसी वर्ष में संघर्ष और टकराव के चलते 19,000 लोग विस्थापित हुए। जो स्पष्ट तौर पर दिखाता है कि भारत में विस्थापन का सबसे बड़ा कारण बाढ़, सूखा, तूफान जैसी आपदाएं हैं। जबकि कश्मीर में हुआ संघर्ष और त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल में राजनीतिक और चुनावी हिंसा जैसी घटनाओं के चलते 2019 में करीब 19,000 लोग विस्थापित हुए थे पर आपदाओं से इनकी तुलना करें तो यह आंकड़ें काफी कम हैं।
17. ब्रिटिश शासनकाल में वन एवं वन्यजीव
प्रबंध का वर्णन करें|
पहली बार सभी जंगल व चरागाहें सरकार के नियंत्रण में लाई गईं। 1927 में अंग्रेजों द्वारा किए गए अंतिम संशोधन ने यह सुनिश्चित किया कि देश की तमाम वन भूमि एवं चरागाहें वन एवं राजस्व विभाग के प्रशासन व अधिकार क्षेत्र में शामिल हो गईं। इस कानूनी संशोधन के तहत शासन को बंजर भूमि को प्रभावी रूप से नियंत्रित करने की छूट दी गई। जानवरों को उनके प्राकृतिक आवास में संरक्षित करने के लिए राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभयारण्य जैसे सुरक्षात्मक क्षेत्रों का विकास करना। लुप्तप्राय और कमजोर प्रजातियों को चिड़ियाघरों जैसी जगहों पर कैद में रखा जा सकता है और उनकी आबादी बढ़ाने के लिए प्रजनन कराया जा सकता है। वनों की कटाई पर सख्ती से रोक लगनी चाहिए।
18. स्वतंत्र भारत के कुछ पर्यावरणीय आंदोलनों
का वर्णन करें|
इनमे मुख्य हैं चिपको आंदोलन, नर्मदा आंदोलन, अपिको आंदोलन, आदि। माधव गाडगील तथा रामचन्द्र गुहा, भारतीय पर्यावरण आंदोलनों में मुख्यत: तीन वैचारिक दृष्टिकोण रेखांकित करते हैं: गांधीवादी, माक्र्सवादी तथा उपयुक्त तकनीकी दृष्टिकोण।पर्यावरण आंदोलन एक प्रकार का सामाजिक आंदोलन है जिसमें व्यक्ति, समूह एवं विभिन्न गठबंधन शामिल होते हैं जो पर्यावरण संरक्षण में एक आम रुचि का अनुभव करते हैं तथा पर्यावरण नीतियों और प्रथाओं में परिवर्तन लाने के लिये कार्य करते हैं।
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