जब एक प्रोफेसर ने मुझसे मेरी जाति पूछी



जब एक प्रोफेसर ने मुझसे मेरी जाति पूछी

लेखक: अम्बिका चौधरी
स्थान: गढ़वा (झारखंड)

शिक्षा को समाज का सबसे बड़ा समानता का हथियार माना गया है। हमें यही सिखाया गया कि स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय वो जगहें हैं, जहाँ जाति, धर्म और वर्ग से ऊपर उठकर इंसान को केवल उसकी प्रतिभा और मेहनत से पहचाना जाता है। लेकिन हाल ही में मेरे साथ जो अनुभव हुआ, उसने मुझे अंदर से हिला दिया।

मैंने अपने कॉलेज के एक प्रोफेसर से विनम्रता से पूछा –
“सर, अगर कहीं जॉब की जानकारी हो तो कृपया बताइएगा।”
उन्होंने मेरी तरफ देखा और पूछा –
“किस जाति से हो?”

उस पल मेरे पास कोई जवाब नहीं था, क्योंकि सवाल में ही भेदभाव की बू थी। ये सवाल मेरे आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाने वाला था, क्योंकि मैंने सवाल पूछा था मेरी क्षमता के आधार पर, मेरे वर्ग या जाति के आधार पर नहीं।

क्या यही है शिक्षा की आत्मा?

जब एक कॉलेज प्रोफेसर – जो देश का "आदर्श" माना जाता है – भी जाति पूछे बिना मदद के लिए तैयार नहीं होता, तो सोचिए हमारे समाज की असल बुनियाद कैसी है? क्या समानता, संवैधानिक अधिकार और शिक्षा के माध्यम से सामाजिक न्याय सिर्फ किताबों तक सीमित रह गया है?

जाति: अब भी सबसे बड़ा सवाल

आज हम 21वीं सदी में हैं, चाँद पर जा रहे हैं, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल इंडिया की बात कर रहे हैं, लेकिन जब बात रोजगार, मदद या अवसर की आती है, तो जाति सबसे पहले पूछी जाती है। यही इस देश की सबसे बड़ी विडंबना है।

मेरे लिए यह अनुभव क्या है?

यह मेरे लिए सिर्फ एक व्यक्तिगत अपमान नहीं, बल्कि पूरे उस सोच का पर्दाफाश है जो हमें हर दिन एक अदृश्य जंजीर में बाँधे हुए है।
लेकिन मैं टूटा नहीं हूँ। अब मुझे अनुभव हो गया है — और यह अनुभव ही मेरी सबसे बड़ी ताकत बनेगा।

क्या ऐसे भारत बनेगा विश्वगुरु?

आज हर मंच से बड़े-बड़े नेता और अधिकारी कहते हैं —
"भारत फिर से विश्वगुरु बनेगा।"
लेकिन क्या हम यह सवाल नहीं पूछ सकते कि
"कैसे बनेगा भारत विश्वगुरु, जब हमारे स्कूलों और कॉलेजों में जातिवाद के जहर से भरे शिक्षक बैठे हैं?"

जब एक छात्र रोजगार की आशा में शिक्षक से मदद माँगता है और उसे उत्तर में उसकी "जाति" पूछी जाती है, तब हम किस ज्ञान की बात कर रहे हैं?

विश्वगुरु बनने के लिए सिर्फ तकनीक और विकास नहीं चाहिए,
बल्कि सोच में भी समानता और मानवता चाहिए।

जब तक स्कूल और कॉलेज के शिक्षक जाति के चश्मे से छात्रों को देखेंगे,
तब तक भारत "डिग्रीगुरु" तो बन सकता है,
पर "विश्वगुरु" नहीं।

हम भी छोटे बच्चों को पढ़ाते हैं और इस प्रकार के कभी सोचा नही लेकिन इस प्रकार बड़े कॉलेज में की जाती है 
This is my  personal opinion and experience


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