पटाखा - समाज के लिए अभिशाप "
आजकल पटाखों पर सोशल मीडिया पर काफी चर्चा हो रही है। और जल्द ही दीपावली का त्यौहार भी आने वाला है जिसका एक विशेष हिस्सा पटाखे हैं। आज हमारी वार्ता का यही केंद्रीय विषय है।
वास्तव में देखा जाए तो पटाखा हमारे
समाज के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं है। इस पर विस्तार से चर्चा तो लंबी हो जाएगी, हम संक्षिप्त में इसकी बुराइयों पर वार्ता
करेंगे।
सामाजिक पहलू पर गौर करने पर हमें यह
देखना है कि हम एक शांति मय समाज चाहते हैं या अशांति से भरा समाज जहां शोरगुल
हंगामा बरपा हो। आर्थिक रूप से देखा जाए तो धन की बर्बादी के और फिजूलखर्ची के
अलावा इससे कुछ भी प्राप्त नहीं होता। कितनी मूर्खता है कि हम अगर ₹500 की गड्डी को आग के हवाले कर दे तो लोग हमें
पागल कहेंगे लेकिन यही ₹500 के पटाखे लाकर आखिर हम क्या करते हैं? क्या इन पैसों को आग के हवाले नहीं करते??
स्वास्थ्य की दृष्टि से इनका धुआं हमारे जीवन पर कितना घातक परिणाम डालता है, पर्यावरण को कितना नुकसान होता है इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है, लगाया भी जा रहा है और इसके दुष्परिणाम हम भुगत भी रहे हैं यह बताने की आवश्यकता नहीं है।
जहां तक धार्मिक पहलू का प्रश्न है मुझे
नहीं मालूम किस धार्मिक ग्रंथ में पटाखों की उपयोगिता का वर्णन है? पूछने पर भी संतोषजनक उत्तर आज तक नहीं मिला।
श्री रामचंद्र जी 14 वर्षों का वनवास काटकर आज ही के दिन अयोध्या
नगरी वापस आए थे उन्हीं की याद में खुशियां मनाई जाती हैं। अयोध्या नगरी को दुल्हन
की तरह सजाया गया था, दीप प्रज्वलित किए गए थे, मिठाई बांटी गई थी, पूरे नगर वासी आनंद विभोर होकर एक दूसरे से गले
मिल रहे थे लेकिन इस आनंद के अवसर पर पटाखे आतिशबाजी कर रहे थे ऐसा तो कहीं कोई
उल्लेख नहीं मिलता।
रामराज्य तो आर्थिक, सामाजिक, मानसिक
हर तरह के प्रदूषण से मुक्त था तभी तो तुलसीदास को रामचरितमानस में इसकी प्रशंसा
में यह पंक्तियां लिखनी पड़ी :-
" दैहिक दैविक भौतिक तापा
रामराज्य काहूं नहीं व्यापा "
वास्तव में अगर देखा जाए तो पटाखों में इस्तेमाल होने वाले बारूद का आगमन मुगल साम्राज्य के संस्थापक बाबर से होता है। बाबर ही तोपखाना लेकर हिंदुस्तान आया था और वहीं से हमारे देश में बारूद का चलण शुरू हुआ और आज बढ़ते बढ़ते इस बारूद ने उस दैत्य का रूप धारण कर लिया जिसने मानव समाज को अशांति, विभिन्न प्रकार की स्वास्थ्य समस्याएं, खतरनाक बीमारियां, फिजूलखर्ची, पर्यावरण की बर्बादी, वगैरा के दलदल में धंसा दिया। नए साल का आगमन हो, बर्थडे हो, शादी हो, चुनाव में किसी प्रत्याशी की विजय हो, हत्ता के कोई धार्मिक कार्य त्यौहार हो, हम पटाखे फोड़ने, आतिशबाजी करने को अपनी शान समझते हैं।
दरअसल यह सारा खेल उस पूंजीवादी मानसिकता
का है जो मानवता के नफे और नुकसान से बेपरवाह होकर सिर्फ अपने निजी स्वार्थ, सांसारिक ऐश व आराम की फिक्र में रहती है। इसी
मानसिकता ने आज पूरे मानव समाज में अशांति, बेचैनी, जुल्म, शोषण
और अत्याचार को जन्म दिया है, जिससे
पूरी धरती में बल्कि आकाशो तक एक बिगाड़ फसाद फैल गया है।
क्या मानवता के हितेषी, समाज सुधारक, सच्चे अर्थों में धार्मिक मूल्यों का पालन करने वाले प्रबुद्ध जन, क्या इस अभिशाप से समाज को मुक्ति दिलाने के
बारे में कोई विचार विमर्श के लिए तैयार हैं ?
YouTube Ambika Sir Geography
Whatsapp Ambika Research
Instagram ambika_garhwa
Facebook Page Ambika Research
Telegram Ambika Sir Geography
Donate Here
.png)
.png)
0 Comments