त्रिलोकासन 2023

 त्रिलोकासन


नियमित रूप से आसन, व्यायाम व् प्राणायाम विद्धार्थियो के लिए बहुत अनिवार्य है| इसलिए प्रत्येक विद्धार्थी को सुबह- सुबह कुछ समय आसन एवं व्यायाम करने चाहिए| आसन एवं व्यायाम तन- मन में स्फूर्ति एवं उर्जा का संचार करते हैं| पदमासन से लेकर हलासन तक सभी योगासन बेहद लाभकारी हैं| आज विद्धार्थी त्रिलोकासन करना सिखोगें| त्रिलोकासन करने के लिए दोनों पैरों के बिच लगभग तीन फिट की दुरी बनाकर खड़े हो जाए| दोनों हाथों को अपनी कमर पर इस प्रकार से रखे और धीरे-धीरे जमींन की दोनों पैरों के पंजेबाहर की तरफ निकले हुए हों| इस अवस्था में कमर पर रखे हुए हाथों की कहानी पंजो की सिद्ध में हो जाती है| इस अभ्यास होने पर अधिक बार भी कर सकते हैं|

पिंडली और जंघाए मजबूत होती हैं| पैरों  की कपकपी  दूर होती है|

नियमित रूप से इसे करते रहने में मोटापा कम होता है|

पेट की बीमारियाँ नहीं होतीं, क्योकि इस व्यायाम को करने से पुरे पेट तथा पाचनशक्ति मजबूत होती है|

इस आसन को करने से वृद्धावस्था में भी पैरो एवं जन्घो की हड्डियों की मज्बोती बनी रहती है| इसलिए त्रिलोकासन को करेने की सबसे अच्छी अवस्था बाल्यावस्था है| बाल्यावस्था में इसको की दाल ली जाय तो तन- मन विशेष रूप से पैर, स्वस्थ रहते हैं और पैरों में दर्द आदि की समस्या से मुक्ति मिलाती है|



अनार

प्रसिद्ध कहावत ‘एक’ अनार सौ बीमार सदिय से चली आ रही है| अनार स्वास्थ्यवर्द्धक गुणों से भरपूर फल है| इसका वैज्ञानिक नाम प्यूनिका ग्रेनेटक’ है| यह लाल रंग का होता है| इसमे लाल रंग के छोटे-छोटे सौकड़ों रसीले डेन होते हैं| अनार गर्म प्रदेशों में पाया जाता है| अनार के पेंड अधिकतर महाराष्ट्र,राजस्थान , उतर प्रदेश, हरियाणा, आन्ध्र प्रदेश कर्नाटक, तमिलनाडु और गुजरात में पाए जाते हैं| अनार को संस्कृत में दाड़िम कहते हैं| इसके पेंड व् सुन्दर आकर के होते हैं| इस पेंड पर फल आने से पहले लाल रंग का बड़ा फुल लगता है, जो हरी पतियों के साथ बहुत खुबशुरत दिखता है| यह फल लगभग 3,000 साल पुराना है|अनार प्रचुर मात्रा में लाभदायक प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, फाइबर, विटामिन्स और खनिज पाए जाते हैं| अनार का  प्रयोग कई तरह से किया जाता है|


 राम रेखा धाम

अंत्यंत रमणीय और पावन स्थान झारखण्ड है|यह आस्था केंद भी है| और एतिहासिक धरोधर भी| झारखण्ड एवं छतीसगढ़ की सीमा पर अपने आप में प्राकृतिक सौदर्य को समेत६र यह पवित्र आस्था का केंद है| भगवन श्रीराम से जुडी सारी स्मृतियों से अवगत करत है| तभी तो हर मौसम में श्रद्धालु एवं पर्यटक बड़ी श्रद्धा उल्लास के साथ यहाँ पहुचाते हैं|

पौराणिक मन्यातायो के अनुसार, यही पवित्र स्थल है, यहाँ कबी त्रेता युग में मर्यादा पुरुषोतम श्रीराम ने अपने चरण रखे थे| भगवन श्रीराम के साथ उनकी पत्नी सीता तथा भाई लक्ष्मण भी यहाँ पधारे थे| जमीं ताल से सैकड़ो फिट ऊपर हरे| भरे जंगल एवं पहाड़ो से धीरे इस धाम में कई ऐसे तथ्य हैं| जो वन गमन के क्रम भगवन श्रीराम के झारखण्ड पधार की घटना के प्रमाण प्रस्तुत करते हैं| धाम में अभी से जुड़े लोगो का कहना है कीभगवान श्रीराम इस धाम पर दो बार आये थे| पहली बार वन- गमन के दौरान तथा दूसरी बार राजगद्दी के उपरांत| धाम की चातातानो पर कई आकृतिया बनी हैं| जो इस स्थल से जुडी कहानियो और तथ्यों पर प्रकाश डालती हैं| धाम में झुकी है विशालकाय गुफा के अन्दर बनी लाकिर्नुमा आकृति ही ‘राम रेखा’ के नाम से जनि जाती है| धाम परिसर में धनुष कुंड, गुप्त कुंड, अग्नि कुंड गरुड़ की प्रतिमा, लक्ष्मण कुंड, सीता, भगवान शिव राधा-कृष्ण की प्रतिमा के साथ-साथ गुफा के बहार बने शिवालय और पंचमुखी हनुमान की मूर्ति श्रद्धालुओ को बरबस अपमी ओर आकर्षित करती है| पहाड़ो के ऊपर प्राकृतिक रूप से बने धनुष कुंड एवं गुप्त गंगा में गर्मी के दिनों में भी पर्याप्त पानी उपलब्ध रहता है| प्रतिवर्ष कार्तिक एवं मध् पूर्णिमा के अवसर पर विशाल मेले का आयोजन किया जाता है, जिसमे झारखण्ड के साथ-साथ छतीसगढ़, उड़ीसा,बिहार एवं बंगाल से लाखो की संख्या में श्रद्धालु पहुचने के लिए लोग रांची से सिमडेगा होकर रामरेखा धाम पहुच सकते हैं, रामरेखा धाम पहुच सकते हैं| वहा से रामरेखा धाम जिसकी दुरी 196 किलोमीटर है| सिमडेगा तक पहुचने के लिए बसों एवं टैक्सीयो की व्यवस्था रहती है| वहा से राम रेखा धाम तक जाने के लिए यात्री वहां उपलब्ध रहते हैं| छोटे वहां पहाड़ के ऊपर बने मंदिर तक पहुच जाते हैं|

घड़ी 

छोटी से हूँ लेकिन फिर भी बड़े काम की मणि जाती, सदा समय को पाबन्दी में रहना सबको हूँ सिखलात| कभी जेब में पड़ी ठुमकती कभी कलाई पर बंध जाती, कभी मेज पर बैठे थर से, टिक–टिक टिक-टिक राग सुनाती| छोटी से पर ऊपर होती बड़ी हूँ, सोच रहे होंगे मैं क्या हूँ? तो केवल एक घड़ी हूँ|





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