एक छोटा सा किस्सा शेयर कर रही हूँ
जिस वक्त मेरे पति मुझे तंग कर रहे थे
उसी बीच मेरे हाथ वो सारे सबूत लग जाते हैं जिनको पाकर मेरे जीवन की सारी बातें समझ आ जाती है मेरे पति पूरी तरह से मुझे घर में बेवक़ूफ़ बना रहे थे लेना देना कुछ नहीं था मेरा नाम ऑफिस से काटा जा चुका था बंदा विवाह भी कर रहा था..या मालूम नहीं कर के बैठा हुआ था... .मेरा बेटा बोलता है कि मेरे दोस्त के परिचित हैं पुलिस वाले..वो आपका काम कर देगे मैं मुस्कुरा देती हूँ मुझे मालूम है कि FIR दर्ज करवाने में पसीने छूट जाते हैं.. मेरा बेटा जब FIR की बात करता है तो पुलिस वाला बहाने बना देता है ..अब मैं अपने बच्चों के साथ स्वयं थाने जाती हूँ उससे पहले मैं अलवर कलक्टर नन्नुमल पहाड़िया जो हमारे गांव के ही हैं मिल चुकी थी और बिना किसी मदद किए इन्होंने हमको सप्रेम विदा कर दिया.... ये चाहते तो घर की बात सड़क पर कभी नहीं आती फैसला जो भी होता किस्सा खत्म हो जाता क्यूंकि मेरे पति ने विवाह तोड़ा भी नहीं और प्रीत निभाई भी नहीं ताउम्र..काश यह तोड़ लेता समबन्ध तो मैं भी चैन से जीती इसने मुझे पालतू कुत्ते के समान इस्तेमाल किया यह अपराध करता रहे और मैं इसको देवता मानकर इसके अपराधो पर पर्दा डालती रहूँ. और मैं ऐसा ही करती भी रही.. साथ में इस दुष्ट से मार भी खाती रही इसका जब मन होता तब अचानक से मुझ पर हमला कर देता था जैसे गर्म चाय का प्याला अक्सर दूर से मेरे ऊपर बातों बातों में फैंक देता था या कोई भारी वस्तु सर में दे मारता था..थोड़ी देर में सामान्य हो जाता था मैं इसकी तरह पागलपन कभी नहीं कर सकीं क्योंकि अपने पति को बेदर्दी से मोका लगाकर पीटना न्यायोचित नहीं है..और इसी बात का इसने हमेशा फायदा उठाया है
अब मैं अगले दिन अलवर थाना सदर मैं अपने बच्चों को लेकर रात के 7बजे जाती हूँ दिन भर FIR लिखती हूँ टाइप कराने में रात हो जाती है..काफ़ी देर इंतजार करने के बाद थानेदार बुलाता है मैं संक्षिप्त में बताकर FIR उसकी टेबल पर रख देती हूँ... वो पढ़कर कार्यवाही करने से मना कर देता है
जैसे ही वो गर्दन हिलाता है मैं कुर्सी से उठकर तेजी से उसके हाथ से अपनी फ़ाइल खींचती हूँ जिसको वह मजबूती से पकड़ लेता है..तब वह मेरे बच्चों से बोलता है की अरे रोकिए इनको
मैंने ऐसी महिला नहीं देखी...तब मैंने उसकी ओर देखकर कहा और मैंने ऐसा थानेदार...अगर मेरी FIR झूठी हैं तो FR लगा देना यदि सही है तो दर्ज कीजिए...सरकार ने आपको लोगों की सहायता के लिए बैठा रखा है इसलिए नहीं कि आप कागज देखकर मना करे जांच कीजिए...और नहीं करनी है तो आपके ऊपर भी SP .ऑफिस है मैं वहाँ जाऊँगी..मेरे काग़ज इधर दीजिए..वह मुझे डराता है मैं उस पर चढ़ बैठती हूँ..मेरे बेटे चुपचाप तमाशा देखते हैं.... फिर वह SP का नाम लेते ही डर जाता है क्योंकि उस वक्त कोई महिला SP थी..जो काफी कड़क थी...वह मुझे कार्यवाही करने का आश्वासन देता है और मैं बाहर आ जाती हूँ ...बाहर आकर मैं कलक्टर साहब को पुनः फोन करतीं हूँ और निवेदन करतीं हूँ कि FIR कराने में मेरी मदद करे थानेदार को फोन कर दे लेकिन कलक्टर साहब साफ़ मना कर देते हैं और मुझे कहते हैं कि यह SP का काम है मेरा नहीं....तभी मैं पूजा कपिल मिश्रा जी जो भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की उपाध्यक्ष हैं
को फोन करतीं हूँ ...दीदी उस वक्त बंगाल की किसी मीटिंग में होती है..लेकिन मीटिंग रोक कर मेरा फोन उठा लेती है मैंने दीदी से कहा दीदी मैं विजया सिंह बोल रही हूँ सदर थाना अलवर मे खड़ी हुई हूँ और यह पुलिस वाले कार्यवाही नहीं कर रहे हैं...पूजा दीदी उसी वक्त कहती हैं थाने पर जो भी अधिकारी मौजूद हैं उससे मेरी बात कराए..मैं फोन स्पीकर पर करके थानेदार को दे देती हूँ... दीदी उसे अपना परिचय देती है और पूजा दीदी के जो शब्द थे वह इस प्रकार थे...थानेदार साहब यह हमारी मैडम है डॉक्टर विजया सिंह मैं इनको बहुत अच्छे से जानती हूँ वो भी वर्षों से इन्होंने हमारे कॉलेज में भी काम किया है..पता नहीं इनकी कौन सी मजबूरी यहां तक ले आई..मेरे हिसाब से इनको यहां इस वक्त नहीं होना चाहिए था और अगर ये आई है तो जरूर कोई मजबूरी होगी आप इनका जो भी काम है जरूर कीजिए..और मुझे दूबारा फोन नहीं करना पड़े..वैसे मैं अलवर आने पर मिलती हूँ आपसे... और थानेदार मेरी FIR दर्ज कर लेता है...जिसकी प्राप्ति की कॉपी लेकर मैं घर आ जाती हूँ..मैं नहीं पढ़ती थाने में की उसमें क्या लिखा है..
अगले दिन पढ़ती हूँ तो वह परिवाद दर्ज होता है FIR नहीं मुझे खुद पर गुस्सा आता है..मैं चाहती तो अगले दिन थाने या SP ऑफिस जा सकती थी
लेकिन यह सोचकर वापस थाने नहीं जाती की ठुल्ला छोड़ेगा तो मेरे पति को भी नहीं और मैं जानती हूं कि मेरे पति बहुत डरपोक है पुलिस से बहुत डरते हैं..और फिर हुआ भी यही की बन्दा उसके बाद चड्डी भी लेने घर नहीं आया.. और ना ही ऑफिस गया
क्यूंकि ऑफिस वालों ने बताया कि आजकल ऑफिस भी नहीं आ रहे हैं मैं समझ जाती हूँ कि पुलिस अपना काम कर रही है
जिस दिन पकड़ा गया उस दिन या तो जेल में अन्यथा रुपये के बिना नहीं छूटेगा...
कहते हैं वक्त बुरा होता है तो इंसान की पहचान भी हो जाती है. मैंने तो पूजा दीदी को ऐसे ही फोन कर दिया था
नहीं जानती थी कि इतना अपनापन मिलेगा इन्होंने बिल्कुल बड़ी बहन का फर्ज अदा किया दीदी को आज तक भी नहीं मालूम कि मेरे साथ क्या हुआ है मैं किस मुसीबत में हूँ क्योंकि उस दिन के बाद हमारी कोई बात नहीं हुई और मैं भी उनसे मिलने उनके घर पर नहीं जा सकीं.. अगर कोई व्यक्ति 10 वर्षों बाद भी आपको आवाज़ से पहचान ले और फोन पर ही आपकी मदद बिना कुछ पूछे कर दे वह भी उस वक्त जब आपको मदद की सबसे ज्यादा आवश्यकता हो ...तब उस व्यक्ति के सम्मान को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जाता है बड़ा वह होता है जो बड़ा बनकर भी अपने परिचितों को कभी नहीं भूलता है...मुझे विश्वास है कि पूजा दीदी का यह व्यवहार उनको ऊंचाइयों के शिखर तक अवश्य लेकर जाएगा..
और कलक्टर साहब न्ननुमल पहाड़ियां जो हमारे गांव के है ससुराल के उन्होंने अपनी ओकात सब कुछ जानकर भी दिखा दी..तब ऐसे आदमी भाजपा में शामिल होकर क्या करेंगे.. ना आप सरकार के है क्योंकि रिश्वतखोरी में रंगे हाथ पकड़े जाते हैं...और ना ही सामाजिक व्यक्ति है जिस परिवार में बैठे उसी को नष्ट कर दिया...जिस गाँव से टिकट माँग रहे हैं उस गाँव की सबसे अधिक शिक्षित समझदार स्त्री को न्याय नहीं दिला सके वह भी कलक्टर की कुर्सी पर बैठकर...अब विधायक बनकर कोन सा तीर मारेंगे ज़ाहिर सी बात है अपने खाली खजाने को भरने के लिए जनता के बीच आना चाहते हैं तो जनाब जनता मूर्ख नहीं है....
सादर राधे राधे डॉक्टर विजया सिंह
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