दिल हिला देने वाला कहानी



साभार

बनारस कैंट पर दो रिक्शा वाले बतिया रहे थे कि एक

विदेशी उनके करीब आकर रुका।

डू यू नो इंग्लिश? उसने पूछा।

दोनों बितर-बितर उसे देखते रहे।

पार्ले वू फ्रासेज़? वाही बात उसने फ्रेंच में दोहरायी।

दोनों के चेहरे पर कोई भाव नहीं आये।

पार्ले इटेलियनो?

जवाब नदारद।

''हाबलान अस्तेदी एस्पानोल?'' वही बात उसने

स्पेनिश में बोली।

दोनों के चेहरे पर शिकन तक न उभरी।

तंग आकर वो रुखसत हो गया।

दोनों रिक्शावाले कुछ क्षण उसे जाते देखते रहे, फिर

उनमें से एक बोला--''यार हम सोचत हई हमहन के ढेर ना त एकाक विदेशी भाषा सीख लेवे के चाही, कभी काल काम आई''

"धत्त मर्दे।'' दूसरा बोला- ''ओ भोसड़ीवाले क 4-4 विदेशी भाषा आवत रहल, कौनो काम आयल?"




 लड़ते रहो, गिरते रहो और आगे बढ़ते रहो....!"

   लोग क्या कहेंगे? यह सोच कई लोगों की प्रगती में बाधा बनी है। मैनें तस्वीर के माध्यम से बतायी गयी एक कहानी पढ़ी थी।एक गधे को लेकर पति-पत्नी रास्ते से कही जा रहे थे।पहली तस्वीर में पति-पत्नी और गधा तीनों चल रहे थे। उनको देखकर लोग बोल रहे थे, 'कितने मूर्ख है ये? चलकर ही जाना था तो गधे का क्या उपयोग?' दूसरी तस्वीर में वह दोनों गधे पर बैठकर जा रहे थे। उसपर लोग बोल रहे थे, 'कितने निर्दयी  लोग है, दोनों एक गधे पर बैठे है।उस बेचारे जानवर के बारें में कुछ भी नहीं सोचा।' बीवी को गधे पर बिठाकर खुद साथ में चल रहे तीसरी तस्वीर में लोग कह रहे थे, 'देखो, बीवी का कितना गुलाम है।'और चौथी तस्वीर में पति गधे पर बैठा था, बीवी साथ में चल रही थी। उस तस्वीर पर लोगों की प्रतिक्रिया थी, 'देखो कितना सेल्फीश है। बीवी को चला रहा है और खुद गधे पर बैठकर आराम से जा रहा है।'

      समझने की बात यह है की कुछ लोगों को सिर्फ निगेटिव सोचने और बुराइयाँ निकालने की आदत होती है। उनपर ध्यान मत दिजिये।कई हुनरमंद युवाओं के प्रयासों में बाधा डालने का काम ये लोग करते है।जीवन का रास्ता खुद चुनना होता है और उस रास्ते पर खुद के साथ ईमानदार रहकर सफर करना चाहिये। जो मैं कर रहा हूं वह काम सही है, और लोगों के भले के लिये है ऐसा खुद को लगा तो उसका स्वीकार कर आगे बढ़ना चाहिये। जैसे गलत काम को गलत कहनेवाले लोग है वैसे ही सही काम को भी गलत कहकर हर कदम पर उसका गलत प्रचार करनेवाले लोग भी समाज में बहुत है।वो हर जगह आपको मिलेंगे।उनके साथ बिना बहस किये आगे बढ़ते रहना चहिए, अपना काम करते रहना चाहिये।क्योंकि अगर आप किसी मूर्ख व्यक्ति के साथ बहस करेंगे तो वह आपको उसकी लेवल पर लाकर छोडेगा।अगर कोई आपके खिलाफ प्रचार कर रहा है तो उसको नजर अंदाज करके खुद की सफलता के लिये शिद्दत से मेहनत करना यही सबसे अच्छा जवाब है।

          जब मैं सरकारी शिक्षक बना था तो सिविल सेवा परिक्षा की तैयारी करने के लिये 2010 में नौकरी का इस्तीफ़ा दिया था। उस समय लोग कहते थे, 'पागल हो गया है ये, इसे रहने के लिये घर नहीं है, माँ चूड़ियाँ बेचती है और इसने अच्छी खासी सरकारी नौकरी का इस्तीफ़ा दिया।' और आगे जाकर 2012 में जब मैं आईएएस बना तो यही लोग बोलने लगे, 'हिम्मत और खुद के उपर का भरोसा क्या होता है ये रमेश घोलप से सीखो।सरकारी नौकरी का इस्तीफ़ा देने की हिम्मत दिखायी थी उसने।जो ठान लिया वह हासिल किया।' ऐसे होते है कुछ लोग। लोग क्या कहेंगे यही सोचता रहता तो आज मैं आईएएस नहीं होता।

       भला आपके ज़िंदगी के सपने और उसे सच कर दिखाने का साहस कोई और कर सकता है?नही न... तो फिर औरों के हिसाब से क्यों चलना...आपकी योग्यता, क्षमता, पसंद, सपने, ऊर्जा ये सब सिर्फ आपको पता होते है।उसके अनुसार निर्णय लेना चाहिये। लोग चाहे कुछ भी कहे, खुद के परिश्रम से वह निर्णय सही था यह साबित करके दिखाना चाहिये।आपकी सफलता कभी न गिरने में नही है बल्कि गिर कर उठने में है।जब कोई बात आपके बस की नहीं है ऐसा लोग कह रहे होते है, तभी वह कर के दिखाने में असली मजा होता है।

दोस्तों,

"मेहनत करना मत छोड़ो। प्रयास जारी रखो।

लड़ते रहो, गिरते रहो और आगे बढ़ते रहो।"

         -रमेश घोलप (आईएएस)

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 Ramesh Gholap DC Garhwa





----- मर्द -----

आज हमेशा के मुकाबले ट्रेन में कम भीड़ थी। सुरेखा ने खाली जगह पर अपना ऑफिस बैग रखा और खुद बाजू में बैठ गई।
पूरे डिब्बे में कुछ मर्दों के अलावा सिर्फ सुरेखा थी। रात का समय था सब उनींदे से सीट पर टेक लगाये शायद बतिया रहे थे या ऊँघ रहे थे।
अचानक डिब्बे में 3-4 तृतीय पंथी तालिया बजाते हुए पहुँचे और मर्दों से 5-10 रूपये वसूलने लगे।
कुछ ने चुपचाप दे दिए कुछ उनींदे से बड़बड़ाने लगे।
"क्या मौसी रात को तो छोड़ दिया करो हफ्ता वसूली..."
वे सुरेखा की तरफ रुख न करते हुए सीधा आगे बढ गए।
फिर ट्रेन कुछ देर रुकी कुछ लडके चढ़े फिर दौड़ ली आगे की ओर ,सुरेखा की मंजिल अभी 1 घंटे के फासले पर थी।
वे 4-5 लड़के सुरेखा के नजदीक खड़े हो गए और उनमे से एक ने नीचे से उपर तक सुरेखा को ललचाई नजरो से देखा और बोला...
"मैडम अपना ये बैग तो उठा लो सीट बैठने के लिए है, सामान रखने के लिए नहीं..."
साथी लडको ने विभत्स हंसी से उसका साथ दिया।
सुरेखा अपना बैग उठाकर सीट पर सिमट कर बैठ गई।
वे सारे लड़के सुरेखा के बाजू में बैठ गए।
सुरेखा ने कातर नजरो से सामने बैठे 2-3 पुरषों की ओर देखा पर वे ऐसा जाहिर करने लगे मानो सुरेखा का कोई अस्तित्व ही ना हो।
पास बैठे लड़के ने सुरेखा की बांह पर अपनी ऊँगली फेरी बाकि लडको ने फिर उसी विभत्स हंसी से उसका उत्साहवर्धन किया।
"ओ ...मिस्टर थोडा तमीज में रहिये"
सुरेखा सीट से उठ खड़ी हुई और ऊँची आवाज में बोली।
डिब्बे के पुरुष अब भी एलिस के वंडरलैंड में विचरण कर रहे थे।
"अरे ..अरे मैडम तो गुस्सा हो गई ,अरे बैठ जाइये मैडम आपकी और हमारी मंजिल अभी दूर है तब तक हम आपका मनोरंजन करेंगे " कत्थई दांतों वाला लड़का सुरेखा का हाथ पकड़कर बोला।
डिब्बे की सारी सीटों पर मानो पत्थर की मूर्तियाँ विराजमान थी।
उधर उन तृतीय पंथी के लोगो ने सुरेखा की आवज सुनी और आगे आये
"अरे तू क्या मनोरंजन करेगा हम करते हैं तेरा मनोरंजन"
"शबाना ..उठा रे लहंगा, ले इस चिकने को लहंगे में बड़ी जवानी चढ़ी है इसे "
"आय ...हाय मुंह तो देखो सुअरों का, कुतिया भी ना चाटे"
"बड़ी बदन में मस्ती चढ़ी है इनके, जूली ..उतारो इनके कपडे , पूरी मस्ती निकालते है इनकी "
जूली नाम का भयंकर डीलडौल वाला तृतीय पंथी जब उन लडकों की तरफ बढ़ा तो लड़के डिब्बे के दरवाजे की ओर भाग निकले और धीमे चलती ट्रेन से बाहर कूद पड़े।
सुरेखा की भीगी आँखे डिब्बे के कथित मर्दों की तरफ पड़ी जो अपनी आँखे झुकाए अपने मोबाइल में व्यस्त थे
और असली मर्द तालिया बजाते हुए किसी और डिब्बे की ओर बढ़ चुके थे।




लगभग दस साल का अखबार बेचने वाला बालक एक मकान का गेट बजा रहा है..

(शायद उस दिन अखबार नहीं छपा होगा)
मालकिन - बाहर आकर पूछी "क्या है ?
बालक - "आंटी जी क्या मैं आपका गार्डेन साफ कर दूं?
मालकिन - नहीं, हमें नहीं करवाना..
बालक - हाथ जोड़ते हुए दयनीय स्वर में.. "प्लीज आंटी जी करा लीजिये न, अच्छे से साफ करूंगा।
मालकिन - द्रवित होते हुए "अच्छा ठीक है, कितने पैसा लेगा?
बालक - पैसा नहीं आंटी जी, खाना दे देना..
मालकिन- ओह !! आ जाओ अच्छे से काम करना....
(लगता है बेचारा भूखा है पहले खाना दे देती हूँ.. मालकिन बुदबुदायी)
मालकिन- ऐ लड़के.. पहले खाना खा ले, फिर काम करना...
बालक - नहीं आंटी जी, पहले काम कर लूँ फिर आप खाना दे देना...
मालकिन - ठीक है ! कहकर अपने काम में लग गयी..
बालक - एक घंटे बाद "आंटी जी देख लीजिए, सफाई अच्छे से हुई कि नहीं...
मालकिन -अरे वाह ! तूने तो बहुत बढ़िया सफाई की है, गमले भी करीने से जमा दिए.. यहां बैठ, मैं खाना लाती हूँ..
जैसे ही मालकिन ने उसे खाना दिया.. बालक जेब से पन्नी निकाल कर उसमें खाना रखने लगा..
मालकिन - भूखे काम किया है, अब खाना तो यहीं बैठकर खा ले.. जरूरत होगी तो और दे दूंगी..
बालक - नहीं आंटी, मेरी बीमार माँ घर पर है.. सरकारी अस्पताल से दवा तो मिल गयी है, पर डाॅ साहब ने कहा है दवा खाली पेट नहीं खाना है..
मालकिन रो पड़ी.. और अपने हाथों से मासूम को उसकी दुसरी माँ बनकर खाना खिलाया..
फिर... उसकी माँ के लिए रोटियां बनाई.. और साथ उसके घर जाकर उसकी माँ को रोटियां दे आयी....
और कह आयी-
"बहन आप तो बहुत अमीर हो.. जो दौलत आपने अपने बेटे को दी है वो हम अपने बच्चों को नहीं दे पाते हैं".ईश्वर बहुत नसीब वालों क़ो ऐसी औलादे देता है





एक बुजुर्ग ट्रेन में सफर कर रहा था, संयोग से वह कोच खाली था। तभी 8-10 लड़के उस कोच में आये और बैठ कर मस्ती करने लगे।
एक ने कहा - " चलो, जंजीर खीचते है ".
दूसरे ने कहा - यहां लिखा है 500 रु जुर्माना ओर 6 माह की कैद
तीसरे ने कहा - "इतने लोग है चंदा कर के 500 रु जमा कर देंगे।
चन्दा इकट्ठा किया गया तो 500 की जगह 1200 जमा हो गए, जिसमे 200 के तीन नोट, 2 नोट पचास के बांकी सब 100 के।
चंदा पहले लड़के के जेब मे रख दिया गया। तीसरे ने कहा, "जंजीर खीचते है, अगर कोई पूछता है, तो कह देंगे बूढ़े ने खीचा है। पैसे भी नही देने पड़ेंगे तब।"
बुजुर्ग ने हाथ जोड़ के कहा, "बेटे मैने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है, मुझे क्यो फंसा रहे हो ?
लेकिन लङके नही माने। जंजीर खीची गई। टीटीई आया सिपाही के साथ, लड़कों ने कहा- "इस बूढे ने जंजीर खीची है।
टीटी बूढ़े से बोला, "शर्म नही आती इस उम्र में ऐसी हरकत करते हुए ?
बुजुर्ग हाथ जोड़ कर कहा, " साहब" मैंने जंजीर खींची है, लेकिन मेरी बहुत मजबूरी थी।
टीटी ने पूछा, "क्या मजबूरी थी ?
बूढ़े ने कहा, " मेरे पास केवल 1200 रु थे, जिसे इन लड़को ने छीन लिए और इस पहले लड़के ने अपनी जेब मे रखे है। जिसमे 200 के तीन नोट, 2 नोट पचास के बांकी सब 100 के हैं।
अब टीटी ने सिपाही से कहा, "इसकी तलाशी लो"
जैसा बुजुर्ग ने बताया वैसे ही नोट मिलाये गए लड़के के जेब से 1200 रुपये बरामद हुए, जिनको टी टी ने बुजुर्ग को वापस कर दिये गये और लड़कों को पुलिस के हवाले कर दिया।
पुलिस के साथ जाते हुए लड़को ने बुजुर्ग की ओर घूर के देखा तो बुजुर्ग ने कहा - बेटा, ये बाल यूँ ही सफेद नही हुए है


धंधा और नौकरी

एक बड़ी कंपनी के गेट के सामने एक मशहूर समोसे की दुकान थी, दोपहर में एक बार कंपनी के कर्मचारी वहां समोसे खाना खाते थे।

एक दिन कंपनी के एक मैनेजर ने चटखारे लेकर समोसेवाले से मजाक के मूड में आ गया।

मैनेजर साहब ने समोसेवाले से कहा, "यार गोपाल, दुकान की दुकान बहुत अच्छे से मेंटेन की है, लेकिन क्या तुम्हें नहीं लगता कि तुम अपना समय और स्थापत्य समोसे बेचकर खराब कर रहे हो।? सोचो अगर तुम मेरी तरह इस कंपनी में काम करोगे "रहे हो तो आज कहा होगा.. हो सकता है शायद तुम भी आज मैंने कहा होगा मेरी तरह.."

इस बात पर समोसेवाले गोपाल ने बड़ा सोचा, और बोला, "सर ये मेरा काम आपके काम से कहीं बेहतर है, 10 साल पहले जब मैडॉक्टरी में समोसे बेचने का काम किया था, तब आपकी जेब लगी थी, तब मैं लाखों रुपये कमाता था और आपका पगार दस हज़ार था.

इन 10 सालों में हम दोनों ने बहुत मेहनत की..

आप सुपर डिजायनर से मॅनेजर बन गये।

और मैडॉक से इस प्रसिद्ध दुकान तक पहुंच गया।

आज आप पचास पचास वर्ष के हैं

और मेरी लागत 2,00,000

लेकिन इस बात के लिए मैं अपने काम से बेहतर नहीं कह रही हूं।

ये तो मैं बच्चों के कारण कह रहा हूं।

जरा सोचिए सर मैंने तो बहुत कम कमाई शुरू की थी, लेकिन मेरे बेटे को यह सब नहीं झेलना होगा।

मेरी दुकान मेरे बेटे को मिलती है, मेरी जिंदगी में जो मेहनत की है, वो उसका फायदा मेरे बच्चे उठाएंगे। जबकी आपकी जिंदगी भर की मेहनत का फायदा आपके मालिक के बच्चे उठाएंगे।

अब आपके बेटे को आप डायरेक्टली अपनी पोस्ट पर तो नहीं असिस्ट कर सकते हैं ना.. उसे भी आपकी ही तरह जीरो से स्टार्टिंग करनी पड़ेगी.. और अपने करियर के अंत में वही पहुंचें जहां आप अभी हो।

जबकी मेरा बेटा बिजनेस को यहीं से और आगे ले जाएगा..

और अपने सेल में हम सबसे आगे निकल जायेंगे..

अब आप ही बताएं कि कौन सा समय और खंडखंड हो रहा है?"

मैनेजर साहब ने समोसेवाले को 2 समोसे के 20 रुपये बेचे और बिना कुछ बोले वहां से खिसक लिए.......!!!

[नौकरी/व्यवसाय



तिलचट्टा कीट वर्ग का एक सर्वाहारी व रात्रिचर प्राणी है। इसे कॉकरोच भी कहा जाता है। अंधेरे में गर्म स्थानों में, जैसे रसोईघर, गोदाम, अनाज और कागज के भंडार में पाया जाता है। पंख से ढका हल्का लाल एवं भूरे रंग का इसका शरीर तीन भागों - सिर वक्ष और उदर में विभाजित रहता है। सिर में एक जोड़ी संयुक्त नेत्र होते हैं और 1 जोड़ी संवेदी एंटीना होती है। एंटीना तिलचट्टो के भोजन ढूंढने में सहायता करता है। वक्ष से दो जोड़ा पंख और 3 जोड़ी - संधि युक्त टांगे रहती है, जो इसके प्रचालन अंगों का कार्य करते हैं। शरीर में स्वसन रंद्र पाए जाते हैं उदर 10 खंडों में विभक्त रहता है। छिपकली एवं बड़ी - बड़ी मकड़ीयां तिलचट्टो की घोर शत्रु है और इन्हें अपना ग्रास बना लेती है। तिलचट्टे का शरीर 2.5 से 4 सेंटीमीटर लंबा तथा 1.5 सेंटीमीटर चौड़ा होता है। शरीर ऊपर से नीचे की ओर चपटा एवं खंड - युक्त होता है। नर  तिलचट्टा मादा तिलचट्टा से थोड़ा छोटा होता है।तिलचट्टा का श्वसन तंत्र अनेक नलिकाएं से बनता है ।ये  नलिका बाहर की ओर श्वसन रंध्र द्वारा खुलती है। तिलचट्टे में 10 जोड़े श्वसन रंध्र होते हैं - दो वक्ष में और आठ उदर में। पूरी दुनिया में तिलचट्टे की चार हजार से ज्यादा प्रजातियां पाई जाती है। इनमें से केवल 30 से 40 ही हमारे आसपास रहती है। मनुष्य के दो घुटने होते हैं, लेकिन तिलचट्टे के 18 घुटने होते हैं। उसकी टांग काटने पर पुनः उग आती है। विश्व का सबसे बड़ा तिलचट्टा दक्षिण अमेरिका में पाया गया था।  उसकी लंबाई 6 इंच के बराबर थी। तिलचट्टे के पंख गिरते समय  उनका संतुलन बनाए रखते हैं। लेकिन उन पंखों  की सहायता से ये दूर तक उड़ नहीं सकते। तिलचट्टे जहां भी रहते हैं, उस स्थान को गंदा कर देते हैं। घरों में बैक्ट्रिया फैलाने का ये प्रमुख कारण है। जहां रहते हैं, वहां 33 अलग-अलग प्रकार के बैक्ट्रिया फैलाते हैं। ये  सबकुछ खा सकते हैं, यानी कि गोंद, गिरीश, साबुन, दीवारों की सफेदी, चमड़ा, किताबों का कवर आदि। तिलचट्टा पूरे 40 मिनट तक अपनी सांस रोक रख सकते हैं, इसलिए यह पानी में भी 40 मिनट तक रह सकते हैं। यह अधिकतर समूह में रहना पसंद करते हैं।अकेला तिलचट्टा अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकता । इसका औसत जीवनकाल 1 वर्ष होता है। ये ज्यादा रेडिएशन में भी रह सकते हैं। मनुष्य को इनको देखकर घृणा  होती है। बच्चे एवं  महिलाएं से डरते हैं, हालांकि ये नुकसान नहीं पहुंचाते। तिलचट्टा घरो में अपना अड्डा न बनाए,इसके लिए घरो को स्वच्छ एवं साफ - सुथरा रखना चाहिए और हर स्थान की नियमित सफाई की जानी चाहिए।








पेड़ पौधे सचमुच हमारे हैं। जिसने पेड़ पौधे लगाए हैं, वह तो कहेगा ही हमारे पेड़ पौधे। जिन्होंने नहीं लगाएं, उन्हें भी मानना पड़ेगा कि पेड़ पौधे हमारे अपने हैं, बिल्कुल अपने वही तो अपना है, जो सुख दुख में काम आए। अब सोचकर देखो, पेड़ पौधे हमारे सुख दुख में काम आते हैं कि नहीं। पता  लगेगा कि बहुत कम आते हैं। फूलों के पौधे आपने लगा रखे हैं या लगे हुए देखे हैं। उन पर सुंदर-सुंदर पत्तों की बीच खिले हुए, हंसते फूल आपने देखे हैं? क्या आपको ये फूल अच्छे लगते हैं? शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा, जिसे फूल अच्छे नहीं लगते हो, उसके मन को नहीं भाते हो।  ऐसे फूलों के बीच में रहने का अवसर मिले तो कौन खुश नहीं होगा, किसे आनंद नहीं आएगा! तो जो हमारे सुख में सुखी, जिनके सुख में हम सुखी, वे हमारे हुए कि नहीं। रंग बिरंगे फूल, खिले हुए फूल, मुस्कुराते फूल और फल। फल, जो पेड़ों पर लगते हैं, पकते हैं, पेड़ लद जाते हैं, फिर हमें बुलाते हैं। देखकर मन का मोर नाच उठता है। फलों का स्वाद लेने के लिए मुंह में पानी भर जाता है। अंदर से भूख जागने लगती है। फल हमारी भूख मिटाते हैं। भूख ही नहीं मिटाते, हमारी शक्ति भी बढ़ाते हैं, हमें रोगों का सामना करने की शक्ति देते हैं, विटामिन और खनिज देते हैं, अनेक रोगों का इलाज भी करते हैं। अब बताइए वे हमारे है कि नहीं?
 पेड़ पौधे हमारे हैं तो इन्हें कष्ट क्यों दे? अपनों को कोई दुख देता है क्या? इनको पत्थर मारना ठीक नहीं। इनको चोट लगेगा तो इन्हें दुख होगा। इनका दुख भी हमारा दुख ही तो है। अतः किसी पेड़ को पत्थर मत मारो, उसे मत तोड़ो।
 पेड़ों की पत्तियां वास्तव में पेड़ों के कपड़े हैं। जैसे आप कपड़े पहनते हैं तो अच्छे लगते हैं। यदि कोई आपके कपड़े फाड़ दे तो आपको बुरा लगेगा कि नहीं? इसी प्रकार, यदि हम बेमतलब पेड़ों की पत्तियां तोड़ तोड़कर फेंक देंगे तो पेड़ देखने में सुंदर नहीं लगेगा और उसे बहुत कष्ट भी होगा। क्या हम अपनों को इस तरह पीड़ित करना ठीक समझते हैं? नहीं, सचमुच नहीं! आप भी पेड़ों को बिना पत्तों का देखकर खुश नहीं होंगे।






बंदरो की दुनिया

मनुष्य का मन चंचल उसी तरह जानवरों में बन्दर बेहद चंचल प्राणी है| यह अपनी चंचलता के कारण प्यरी दुनिया में जाना जाता है| एक दल से दूसरी डाल पर उछालना, पेंड़ो पर नाचना-कूदना, फलों को तोड़कर खाना इन्हें बहुत पसंद होता है| बंदरों के तकरीबन 260 प्रकार के होते हैं| कुछ बन्दर जमीन पर और कुछ पेंड़ पर रहते हैं| ज्यादातर बंदरों की पूछ होती है|फिल्मो और सर्कस में बंदर के करतब काफी पसंद किये जाते हैं | बन्दर नटखट होने के साथ- साथ बहुत बुद्धिमान भी होते हैं| अनेक जानवरों की कहानियों में बंदरों के विभिन्न तरह के पात्र मन को बेहद लुभाते हैं| सबसे अधिक हैरानी की बात यह है की जब बन्दर स्वयं को दर्पण में निहारना है तो वह खुद को पहचान लेता है| है न अचरज भरी बा! बन्दर लगभग 5 करोड़ वर्षो से इस धरती का हिस्सा है| बंदरों को दो श्रेणियों में बटा जा सकत है-

पुराणी दुनिया के बन्दर और नै दुनिया के अन्दर

पुरानी दुनिया के बन्दर एशिया और अफ्रीका में, जबकि नई दुनिया के बन्दर अमेरिका में पाए जाते हैं| आप यह जरुर सोच रहें होंगे की भला यह पुरानी दुनिया के बन्दर का क्या मतलब है| इसका अर्थ यह है की पुरानी एवं नई दुनिया के बंदरो की आदतों में कुछ अंतर होता है|

          पुराणी दुनिया के बंदरो की नाक सकीर्ण और नथने आगे की ऑर होते हैं, जबकि नई दुनिया के बंदरों की नाक चपाती होती है| उनके नथने नाक के किनारों पर होते हैं| नई दुनिया के बंदरों की परिग्राही पूछ होती| जिससे वे किसी भी वास्तु को आसानी से पकड़ लेते हैं, जबकि पुरानी दुनिया के बंदरों की यह पूछ नहीं|  वही पुराणी दुनिया के बंदरों के बंदरों के पास यह थैली नहीं होती| बंदरो की गाल की भीतर थैलिनुमा संरचना होती है, जहाँ वे खाना भरकर रख लेते हैं और बाद में आसाम से खाते हैं और नई दुनिया के बंदरों की होती हैं| प्रजापतियों के आधार पर इनका जीवनकाल 10 से 50 वर्ष तक होती है|

                                                                                      बन्दर जंगलो, ऊचे मैदानों और पहाड़ों पर अधिक पाए जाते हैं| बंदरों की ऊंगलियों के फिंगर प्रितंस मनुष्य की तरह ही होते हैं, इसलिए ये किसी भी चीज को आसानी से लपककर पकड़ लेते हैं| बन्दर मनुष्य की तरह उबासी भी मिलाती-जुलती हैं| उनके अन्दर इंसानों की तरहभावनाए होती है| वे एक दुसरे की मदद करते हैं | यहाँ तक की वे एक-दुसरे के साथ नफरत के भाव भी दिखाते हैं| बच्चों,देखा आपने, बंदरो की दुनिया कितनी अद्भुत होती है|

 

 

 

हमारे पेंड- पैधों

पेंड- पैधों सचमुच हमारे हैं| जिसने पेंड या पौधे लगाए हैं| वह तो कहेगा ही हमारे पेंड-पौधे| जिन्होंने नहीं लगाये, उन्हें भी मानना पड़ेगा की पेंड-पौधे हमारे अपने हैं| बिल्कुल अपने| वही तो अपना है, जो सुख दुःख में काम आये| अब सोचकर देखो, पेंड-पौधे हमरे सुख- दुःख में काम आते हैं की नहीं| पता लगेगा की बहुत काम आता हैं| फूलों के पौधे आपने लगा रखे है या लगे देखे हैं| उन पर सुन्दर-सुन्दर पतों के बिच खिले हुए, हसते फूल आपने देखे हैं? क्या आपको ये फूल अच्छे लगते हैं 


टहलते समय मेरा एक मित्र मिल गया...!
मिलते ही थोड़ी देर इधर उधर की बात करने के बाद उसने बोला कि... यार, ये वैगन R चलाते चलाते बोर हो गया हूँ...
कोई अच्छी गाड़ी सुझाओ न .
इस पर मैंने अपना सुझाव देते हुए कहा कि.... अगर गाड़ी बदलनी है तो फर्स्ट क्लास ऑल्टो ले लो..!
मैक्सिमम 4-5 लाख में आ जायेगी.
इस पर मेरे मित्र ने मुझे घूरते हुए देखा और कहा : साला, हम तुमसे पूछके गलत किये.
हम तो KIA का seltos या फॉर्च्यूनर टाइप गाड़ी सोच रहे हैं..
और तुम हमको छूटिये की तरह ऑल्टो सुझा रहे हो.
इस पर मैं भी शर्मिंदा हो गया और बात को संभालते हुए कहा कि... हाँ यार, फिर तो फॉर्च्यूनर ही लो.
300-400 की स्पीड से चलेगी तो हमलोग लखनऊ भी जल्दी पहुँच जाएंगे कभी गए तो.
पता नहीं क्यों...
लेकिन, मेरे इतना अच्छा विचार देते ही मित्र शाबासी देने की जगह मुझपर ही भड़क गया और मुझसे घूरते हुए कहा कि... अबे, दारू-उरु पीना शुरू कर दिए हो क्या ???
साले, भारत की सड़क पर कौन सी गाड़ी 300-400 की स्पीड में चलती है बे ??
90-100 पर ही चल जाए तो बहुत है.
इस पर मैंने विरोध जताते हुए कहा कि... लेकिन यार, फिर तो 4 लाख की ऑल्टो भी 70-80 की स्पीड तक चल ही जाती है.
तो, महज 10-20 km की स्पीड बढ़ाने के लिए उससे 10 गुणा ज्यादा 30-40 लाख देना कहाँ की बुद्धिमानी है ???
सब तो गाड़ीए है जो सड़क पर ही चलेगी...
महंगी गाड़ी हवा में थोड़े न उड़ने लगेगी.
इस पर मित्र ने झुंझालते हुए कहा कि....अबे लीचड़ आदमी.
कम्फर्ट नाम की भी कोई चीज होती है कि नहीं होती है बे ???
अब ऐसे कहोगे तो फिर तुम्हारे लिए होटल भी तो 500 रुपया का मिल जाएगा.
लेकिन, 25-30 हजार पर डे का होटल होता है कि नहीं होता है बे ??
अब इसमें भी तुम वही भोकाल दोगे कि... होटल में तो सोना ही है.
तो, इससे क्या फर्क पड़ता है कि 500 रुपये वाले रूम में सोएं या 5000 वाले में ???
इस पर मैंने कहा : वही तो.
हम सच में यही बोलने वाले थे कि दोनों में तो सोना ही है.
अब ऐसा थोड़े न है कि 5000 या 25000 वाले रूम में रात 18 घंटा का होगा और हम ज्यादा सो के अधिक पईसा वसूल कर पाएंगे..
जबकि, 500 टकिया रूम में तीने घंटा में भोर हो जाएगा ..???
इस पर मित्र लगभग चिल्लाते हुए कहा कि.... अरे बेवकूफ..
बड़े होटल्स में ज्यादा सोने के पैसे नहीं लगते हैं बल्कि कम्फर्ट और well feeling के पैसे लगते हैं...
इतनी सी बात तुझे समझ नहीं आती है ???
उसकी बात सुनकर मैंने अंतिम बार उससे पूछा कि....
लेकिन यार, अभी तो एक हफ्ता से तुम ही सोशल मीडिया पर पोस्ट पर पोस्ट पेले जा रहे थे कि...
पैसेंजर ट्रेन 130 रुपया में ही गोरखपुर से लखनऊ पहुंचा देती है..
तो, फिर वन्दे भारत में 800 रुपया काहे के लिए देना है .
और, अभी हमको कम्फर्ट का महत्व समझा रहे हो ???
इस पर मित्र सारी बात समझ गया और हंसते हुए कहा :
ओह तो ये बात थी ?
अबे, उ सोशल मीडिया है.
वहाँ यही सब लिखने से लाइक मिलता है इसीलिए हम यही सब लिखते हैं.
अब उसकी बात मुझे भी समझ आ गई और हमदोनों हंसते हुए गाड़ी देखने टोयोटा के शो रूम की ओर बढ़ गए..!



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