जम्मू-कश्मीर में हालिया हिंसा और धर्म के नाम पर राजनीति का खेल







जम्मू-कश्मीर में हालिया हिंसा और धर्म के नाम पर राजनीति का खेल

लेखक: अम्बिका चौधरी,

हाल ही में जम्मू-कश्मीर में जो हिंसक घटनाएं सामने आई हैं, वे न सिर्फ इंसानियत को शर्मसार करती हैं, बल्कि यह भी दिखाती हैं कि आज भी हमारे देश में शांति और एकता को तोड़ने वाले ताकतवर हैं। जहाँ एक ओर हमें कश्मीर में शांति, विकास और भाईचारे की ज़रूरत है, वहीं कुछ राजनीतिक शक्तियाँ इसे धर्म के नाम पर तोड़ने में लगी हैं।

धर्म नहीं, राजनीति का मुद्दा है

भारतीय जनता पार्टी (BJP) अक्सर अपने बयानों और नीतियों में "हिंदू-मुस्लिम" मुद्दों को उछालती रही है। यह तरीका लोगों को बांटने और वोट बैंक की राजनीति का हिस्सा बन गया है। हर बार जब चुनाव नजदीक आता है, तो कोई न कोई धार्मिक विवाद उछाल दिया जाता है। क्या यह मात्र संयोग है, या एक सोची-समझी रणनीति?

देश को जोड़ने की ज़रूरत, तोड़ने की नहीं

आज भारत को अगर किसी चीज़ की सबसे ज्यादा जरूरत है, तो वह है – एकता, भाईचारा और वैज्ञानिक सोच। लेकिन अफसोस की बात यह है कि धार्मिक ध्रुवीकरण और समाज में नफरत फैलाने वाली राजनीति ने देश की आत्मा को जख्म दिए हैं।

शिक्षा और संवाद से ही समाधान

हमें यह समझना होगा कि शिक्षा, वैज्ञानिक सोच और सामाजिक संवाद ही इस समस्या का समाधान है। जब तक हम धर्म के नाम पर बंटे रहेंगे, तब तक कोई भी नेता हमें सिर्फ अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करता रहेगा। इसलिए जरूरी है कि हम धर्म की राजनीति को समझें और सच्चे मुद्दों – जैसे बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और महंगाई पर सवाल करें।

निष्कर्ष:

धर्म किसी भी देश को नहीं तोड़ता, लेकिन जब धर्म का इस्तेमाल राजनीति में किया जाता है, तब वह ज़हर बन जाता है। हमें जागरूक होना होगा और हर उस ताकत के खिलाफ खड़ा होना होगा जो देश को जात-पात या धर्म के नाम पर बांटती है।


कमेंट करने वालो के लिए मेसेज 

हमारा मकसद किसी पार्टी को नीचा दिखाना नहीं, बल्कि सच्चाई को उजागर करना है। यदि किसी भी सरकार या दल द्वारा धर्म के आधार पर बयान दिए जाते हैं या समाज को बाँटने वाले मुद्दे उठाए जाते हैं, तो उस पर सवाल उठाना एक जागरूक नागरिक का कर्तव्य है। अगर BJP धर्म की राजनीति नहीं कर रही, तो ये और अच्छी बात है — लेकिन फिर सवाल उठता है कि हर बार चुनाव के समय ही ये मुद्दे क्यों उठते हैं? हम सभी को मिलकर देश को जोड़ने वाली सोच को आगे बढ़ाना चाहिए, न कि बाँटने वाली को।

पुलवामा हमले का अब तक असली खुलासा क्यों नहीं हुआ?

— और वो भी तब, जब 2019 का लोकसभा चुनाव उसके ठीक बाद हुआ।

1. चुनाव के ठीक पहले हमला — क्या ये महज संयोग था?

14 फरवरी 2019 को हमला हुआ और उसके 2 महीने बाद अप्रैल में लोकसभा चुनाव। उस वक्त सरकार ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बना दिया और देशभर में राष्ट्रवाद की लहर दौड़ गई।
BJP को इसका सीधा फायदा मिला — क्योंकि सवाल उठाने वालों को "देशद्रोही" कह दिया गया।




2. RTI और रिपोर्ट्स के बावजूद कोई पारदर्शिता नहीं

कई RTI में मांगा गया कि उस दिन CRPF को हवाई यात्रा क्यों नहीं दी गई, जबकि हाई रिस्क अलर्ट पहले से था।

न तो सरकार ने जांच की रिपोर्ट सार्वजनिक की, न ही जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई कार्रवाई हुई।

पुलवामा में 300 किमी से ज्यादा विस्फोटक कैसे पहुँचा — इसका कोई जवाब नहीं।



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3. हमले को लेकर पूर्व सैनिकों और अफसरों ने भी सवाल उठाए

CRPF के कुछ पूर्व अधिकारियों और कई एक्स आर्मी ऑफिसर्स ने कहा कि यह "intelligence failure" था, और इसकी गंभीर जांच होनी चाहिए थी।
लेकिन सरकार ने इस पर चुप्पी बनाए रखी।


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4. मीडिया ने भी सवाल नहीं उठाए

उस वक्त TV मीडिया ने इस हमले को "इमोशनल राष्ट्रवाद" के ज़रिए जनता के सामने परोसा, लेकिन कभी असली जिम्मेदारों पर सवाल नहीं उठाए।


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निष्कर्ष:

पुलवामा हमले का पूरा सच आज भी आम जनता के सामने नहीं आया। इसे चुनावी हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया, लेकिन जवाबदेही और पारदर्शिता गायब रही।
यह हम सबके लिए सोचने का विषय है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर अगर सच्चाई छुपाई जाती है, तो देश का असली नुकसान किसका है?


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