कांग्रेस के इतिहास के तीन काल :- 1885 ई. में कांग्रेस की स्थापना के पूर्व भी भारत में ब्रिटिश इंडिया एसोसिएशन इंडियन एसोसिएशन मुंबई प्रेसीडेंसी एसोसिएशन और पूना की सार्वजनिक सभा आदि संस्थाओं द्वारा राजनीतिक क्षेत्र में कार्य किया जा रहा था लेकिन इनमें से कोई भी संख्या अपने कार्य और स्वरूप की दृष्टि से राष्ट्रीय नहीं थी कांग्रेसी ऐसा प्रथम संस्था थे जिस के संबंध में प. मदन मोहन मालवीय किस शब्दों में कहा जा सकता है कि भारत ने अपने आवाज इस महान संस्था में पाई । अतः इस समय से ही बहुत कुछ आंसुओ में कांग्रेस का इतिहास ही स्वाधीनता संग्राम का इतिहास बन गया।
अट्ठारह सौ पचासी से लेकर 1947 ईस्वी तक भारतीय स्वतंत्रता के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अंग्रेज द्वारा जिन विभिन्न रूपों में कार्य किया गया उसके आधार पर कांग्रेस की इतिहास या भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को निम्नलिखित तीन का आलम विभाजित किया जा सकता है :
1. उधार या नरम राष्ट्रीयता का काल (1885-1905) :-
कांग्रेस के 20 वर्ष के इस प्रारंभिक काल में उधार अथवा नरम राष्ट्रीयता का प्रधानता रहे इस युग में कांग्रेस किसी भी प्रकार एक ही क्रांतिकारी संस्था नहीं थी। इसके नेताओं ने ब्रिटिश सम्राट के प्रति विश्वास तथा सहयोग के नीति अपनाएं तथा वे याचना स्मृति पत्र और प्रतिनिधि मंडलों के आधार पर भारतीय जनता को राजनीति अधिकार दिलाने का प्रयत्न करते रहे। कांग्रेस के इस साल की सबसे बड़ी सफलता 18 सो 92 में भारतीय परिषद अधिनियम है।
2 उग्र राष्ट्रीयता का काल (1906-1919) :- कांग्रेसमें अपने प्रथम काल में ब्रिटिश शासन की आधारभूत नया प्रियता में विश्वास रखते हुए प्रार्थना पत्र स्मृति पत्रों और प्रतिनिधिमंडल की नीति अपनाई थी भारतीय जनता को उनके वांछित परिणाम प्राप्त न हुए। अतः कांग्रेस के एक बहुत बड़े वर्ग विशेषता नवयुवक 9 युवकों में इस नीति के प्रति विश्वास नहीं रहा और और 1906 तक कांग्रेस नेतृत्व उग्र राष्ट्रवादी के हाथ में आ गया। उग्र राष्ट्रवादी यो ने कहा कि कांग्रेस को याचना की पद्धति छोड़कर अपने पैरों पर खड़ा होना चाहिए और ब्रिटिश शासन पर दबाव डालकर शासन व्यवस्था में मौलिक परिवर्तन करवाने का प्रयत्न किया जाना चाहिए। सन 1907 में सूरत विच्छेद हुआ, जिससे कांग्रेस दो पक्ष - नाराम दल तथा गरम दल मैं बैठ गई और दोनों दलों के मध्य समझौता 1915 ईस्वी में ही हो सका। इस काल के आराम है मुसलमानों ने मुस्लिम लीग के रूप में अपनी अलग राजनीतिक संस्था का निर्माण किया।
3 राष्ट्रीय आंदोलन का गांधी युग (1920-1947)
:- कांग्रेसका तीसरा काल 1920 से 1947 तक का है। 28 वर्षों की इस काल में महात्मा गांधी ने केवल कांग्रेसी वरुण राष्ट्रीय गतिविधियों के केंद्र बने रहे - अदा इसे राष्ट्रीय आंदोलन का गांधी युग कहा जाता है। इस काल नेपाल हेतु ब्रिटिश सरकार के साथ असहयोग और फिर अहिंसात्मक संघर्ष की नीति अपनाई जिसके तीन निरंतर प्रगति शील चरण - असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन थे। इस काल के प्रारंभ में ही नरम दल के लोग कांग्रेश के पृथक हो गए तथा उन्होंने अपनी अलग संस्था अखिल भारतीय उदार संघ (ALL INDIA LIBERAL FEDERATION) KI स्थापना कर ली। इस काल में हिंदू मुस्लिम मतभेद अपने चरम स्तर पर पहुंच गया। मि. जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने 1940 ईस्वी में पाकिस्तान की मांग की और 1947 ईस्वी में भारतीय स्वतंत्रता के साथ-साथ भारत का विभाजन भी हो गया।
उदारवादी राष्ट्रीयता या कांग्रेस का उदारवादी पक्ष (1885-1905) :-
उदार राष्ट्रीयता के इस काल में कांग्रेस के ध्येय, दृष्टिकोण और कार्य पद्धति का ज्ञान प्राप्त करने के लिए इस वर्षों में कांग्रेस के कार्यक्रम और क्रियाकलाप का संक्षिप्त विवरण आवश्यक है।
उदारवादी कर्म से सुधार की नीति में विश्वास करते थे। इसलिए उनके द्वारा व्यवहारिक दृष्टिकोण अपनाते हुए बहुत ऊंची मांगे नहीं की गई। उदारवादी राष्ट्रीयता के 20 वर्षों में कांग्रेस द्वारा की गई बहुत मांगी थी- भारतीय शासन की जांच, भारत मंत्री तथा भारत परिषद का, केंद्रीय तथा प्रांतीय विधान परिषद का विस्तार तथा सुधार, भारतीयों की उच्च नागरिक तथा सैनिक पदों पर नियुक्ति और इंग्लैंड से आने वाले कपड़ों पर आयात कर लगाना आदि। कांग्रेस के द्वारा मांगों के लिए इंग्लैंड में भी प्रचार कार्य किया गया।
उदार राष्ट्रवादीयो (कांग्रेश के उदारवादी पक्ष) की विचारधारा और कार्य पद्धति 1885-1905 के काल में भारत के राष्ट्रीय आंदोलन पर उदार वादियों का प्रभाव और नियंत्रण बना रहा इन उधर वादियों की विचारधारा का अध्ययन निम्न लिखित रूप में किया जा सकता है।
1 ब्रिटिश सरकार के प्रति राज भक्ति - इसमें संदेह नहीं कि प्रारंभिक वर्षों में कांग्रेस का संचालन करने वाले उदर हैं राष्ट्रवादी उच्च कोटि के देशभक्त थे,
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