राष्ट्रीय गीत एवं कुछ खोजकर्ता का विवरण

 


एलेक्जेंडर ग्राहम बेल द्वारा आविष्कार टेलीफ़ोन

टेलीफ़ोन आज सुख सुविधा का साधन मात्र नहीं, बल्कि एक जरुरत बन गया है| यह एक ऐसा यंत्र है, जिसके माध्यम से चुटकियो में संदेश का आदान प्रदान किया जा सकता है| पहले लोगों को अपना सन्देश पहुचने के लिए एक दुसरे के पास जाना पड़ता था; लेकिन अब लेतिफोने के कारण घर बैठे ही अपनी बातें दूसरो तक पहुचाई जा सकती हैं| टेलीफ़ोन को हिंदी में दूरभाष के नाम से जाना जाता है| इसके नाम से अर्थ ज्ञात होता है की दूर दे होने वाली बातचीत| टेलीफ़ोन का आविष्कार महान आविष्कारक अलेक्जेंडर ग्राहम बेल ने किया था| उनक जन्म एडिनबर्ग,स्टॉकलैंड में 3 मार्च 1847 को हुआ था| वे थामस ए. वाटसन के साथ काम करते थे| एक दिन दोनों ने मिलकर टेलीफ़ोन का आविष्कार करने की सोची और इस दिशा में कार्य प्रारंभ किया| दोनों दिन- रात लगे रहते और नई-नई तकनीके खोजते| आखिर सन 1876 में वे इसमे सफल हुए और उनकी कड़ी मेहनत रंग लाई| इस कार्य में ग्राहम बेल की भूमिका अधिक रही, इसलिए टेलीफ़ोन के आविष्कार का श्रेय भी उन्ही को दिया जाता है|लेकिन प्रारंभ में उनके इस आविष्कार को लोगो ने पसंद किया है| पर ग्राहम बेल ने हिम्मत नहीं हारी| उन्हें अपने आविष्कार पर पूरा विशवास था की एक दिन वह पुरे विष में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन ला देना| यही हुआ भी| यह प्रदार्शनी के दौरान उनके इस आविष्कार को पहचान मिली| इसके बाद तो पूरी दुनिया में टेलीफ़ोन को जाना पहचाना और प्रयोग लाया जाने लगा| कुछ ही समय में ग्राहम बेल की दुनिया बदल गई| लेकिन वह अपने साथी वाटसन को नहीं भूले और उन्होंने सफलता मिलाने पर उसे अपनी कम्पनी में हिस्सेदार बना लिया| टेलीफ़ोन अब घर-घर का हिस्सा बना चूका है|  यदि टेलीफ़ोन के माध्यम से किसी दूर के व्यक्ति से बातचीत करनी हो तो नम्बर डायल करने से पहले एस.टी.डी या आई.एस.डी कोड भी लगाना पड़ता है| अब टेलीफ़ोन सेवा दूरस्थ गावो तक भी पहुच चुकी है|और इसके माध्यम से औधोगिक क्रांति भी हुई है| किसी भी आविष्कार का जन्म जिज्ञासा और इच्छा के कारण होता है| यदि आप के अन्दर भी नई-नई और रोचक बातें जानने की जिज्ञासा है तो आने वाले समय में आप भी आविष्कार कर विश्व को अंचभित कर सकते हैं| 

 

 

प्रसिद्ध तबला-वादक जाकिर हुसैन

जाकिर हुसैन भारत के लोकप्रिय शास्त्रीय तबला-वादक हैं| स्थापित तबला- वादक थे| उस्ताद अल्लारक्खा खां भी एक स्थापित तबला-वादक थे| उस्ताद जाकिर हुसैन का जन्म 9 मार्च 1951 को बम्बई में हुआ| उनकी आरम्भिक शिक्षा माहिम के सेंट जेवियर कॉल्लेज से उन्होंने स्नातक की परीक्षा उतीर्ण की|

              तबला–वादक उनके रक्त में प्रवाहित थे| 12 वर्ष की उम्र में ही उन्होंने देश विदेश में घुमाना आरम्भ कर दिया था| सन 1970 में वे संयुक्त राज्य अमेरिका में कार्यक्रम करने गए और वहीं से उन्होंने अपना अंतरास्त्रिय कैरियर आरम्भ किया| जाकिर हुसैन को समकालीन संगीत आन्दोलन का मुख्य वास्तु शिल्पी कहा जाता है| उन्होंने एतिहासिक संगीते की  हैं| इनमे शामिल हैं- शक्ति,जिसकी स्थापना उन्होंने जान मैकलागालिन और एल शंकर के साथ की; दिग रिदम बैंड, मेकिंग म्यूजिक, प्लेनेट, ड्रम विद मिकी हार्ट, तबला बिट साइंस इत्यादि| इनके आलावा, उन्होंने बहुत से कलाकारों के साथ रिकार्डिग और परफार्मिग दी हैं, जिनमें जॉर्ज हैरिसन, जॉर्ज हैंडरसन,वॉन मॉरिसन,जैक ब्रूस, टिटो पुंटे, फरोस सैंडर्स, बिली कोठहम, द हांगकांग सिंफनी तथा न्यू ऑर्लीएंस सिंफनी शामिल हैं| 1987 में जाकिर हुसैन का पहला एकल एलबम ‘मेकींग म्यूजिक’ जारी हुआ| 1988 में भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया|1990 में उन्हें ‘इंडो-अमेरिकन अवार्ड’ से सम्मानित किया गया|अप्रैल 1991 में जाकिर हुसैन को राष्ट्रपति द्वारा ‘संगीत नाटक अकादमी पुरुस्कार’ प्रदान किया गया|जाकिर हुसैन ने कई फिल्मों का संगीत भी तैयार किया,जिनमें से इन कस्टडी’ और  ‘द मिस्टिक मैसर’ प्रमुख हैं| जाकिर हुसैन ने फर्न्सिस कोपोला की ‘अपोक्लेयप्से नाओं’ फिल्म तथा बर्नाड़ो बेटोर्लुक्सी की’ लिटिल बुध्वा’ फिल्म के संगीत में भी तबला-वादन किया है| उस्ताद जाकिर हुसैन आज तबले की थाप और संगीत दोनों के लिए अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर पहचाने जाते हैं| तबले थाप से उन्होंने ऐसी धूम मचाई कि न केवल भारत, बल्कि विदेशों में भी अपनी एक खास जगह बना ली है|

 

 बंदरो की दुनिया

मनुष्य का मन चंचल उसी तरह जानवरों में बन्दर बेहद चंचल प्राणी है| यह अपनी चंचलता के कारण प्यरी दुनिया में जाना जाता है| एक दल से दूसरी डाल पर उछालना, पेंड़ो पर नाचना-कूदना, फलों को तोड़कर खाना इन्हें बहुत पसंद होता है| बंदरों के तकरीबन 260 प्रकार के होते हैं| कुछ बन्दर जमीन पर और कुछ पेंड़ पर रहते हैं| ज्यादातर बंदरों की पूछ होती है|फिल्मो और सर्कस में बंदर के करतब काफी पसंद किये जाते हैं | बन्दर नटखट होने के साथ- साथ बहुत बुद्धिमान भी होते हैं| अनेक जानवरों की कहानियों में बंदरों के विभिन्न तरह के पात्र मन को बेहद लुभाते हैं| सबसे अधिक हैरानी की बात यह है की जब बन्दर स्वयं को दर्पण में निहारना है तो वह खुद को पहचान लेता है| है न अचरज भरी बा! बन्दर लगभग 5 करोड़ वर्षो से इस धरती का हिस्सा है| बंदरों को दो श्रेणियों में बटा जा सकत है-


पुरानी दुनिया के बन्दर और नई दुनिया के अन्दर

पुरानी दुनिया के बन्दर एशिया और अफ्रीका में, जबकि नई दुनिया के बन्दर अमेरिका में पाए जाते हैं| आप यह जरुर सोच रहें होंगे की भला यह पुरानी दुनिया के बन्दर का क्या मतलब है| इसका अर्थ यह है की पुरानी एवं नई दुनिया के बंदरो की आदतों में कुछ अंतर होता है|

                                                                                                पुराणी दुनिया के बंदरो की नाक सकीर्ण और नथने आगे की ऑर होते हैं, जबकि नई दुनिया के बंदरों की नाक चपाती होती है| उनके नथने नाक के किनारों पर होते हैं| नई दुनिया के बंदरों की परिग्राही पूछ होती| जिससे वे किसी भी वास्तु को आसानी से पकड़ लेते हैं, जबकि पुरानी दुनिया के बंदरों की यह पूछ नहीं|  वही पुराणी दुनिया के बंदरों के बंदरों के पास यह थैली नहीं होती| बंदरो की गाल की भीतर थैलिनुमा संरचना होती है, जहाँ वे खाना भरकर रख लेते हैं और बाद में आसाम से खाते हैं और नई दुनिया के बंदरों की होती हैं| प्रजापतियों के आधार पर इनका जीवनकाल 10 से 50 वर्ष तक होती है|

                                                                                                        बन्दर जंगलो, ऊचे मैदानों और पहाड़ों पर अधिक पाए जाते हैं| बंदरों की ऊंगलियों के फिंगर प्रितंस मनुष्य की तरह ही होते हैं, इसलिए ये किसी भी चीज को आसानी से लपककर पकड़ लेते हैं| बन्दर मनुष्य की तरह उबासी भी मिलाती-जुलती हैं| उनके अन्दर इंसानों की तरहभावनाए होती है| वे एक दुसरे की मदद करते हैं | यहाँ तक की वे एक-दुसरे के साथ नफरत के भाव भी दिखाते हैं| बच्चों,देखा आपने, बंदरो की दुनिया कितनी अद्भुत होती है|

 

 हमारे पेंड- पैधों

पेंड- पैधों सचमुच हमारे हैं| जिसने पेंड या पौधे लगाए हैं| वह तो कहेगा ही हमारे पेंड-पौधे| जिन्होंने नहीं लगाये, उन्हें भी मानना पड़ेगा की पेंड-पौधे हमारे अपने हैं| बिल्कुल अपने| वही तो अपना है, जो सुख दुःख में काम आये| अब सोचकर देखो, पेंड-पौधे हमरे सुख-दुःख में काम आते हैं की नहीं| पता लगेगा की बहुत काम आता हैं| फूलों के पौधे आपने लगा रखे है या लगे देखे हैं| उन पर सुन्दर-सुन्दर पतों के बिच खिले हुए, हसते फूल आपने देखे हैं? क्या आपको ये फूल अच्छे लगते हैं? शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा, जिसे फूल अच्छे नहीं लगते हों, उसके मन के नहीं भाते हों| ऐसे फूलों के बीच में रहने का अवसर मिले तो कौन खुश नहीं होगा, किसे आनंद नहीं आएगा ! तो जो हमारे सुख-सुखी जिनके सुख में सुखी, वे हमरे हुए की नहीं | रंग- बिरंगे फूल, खिले हुए फूल मुस्कुराते फूल और फल | फल, जो पेड़ों पर लगते हैं, पकडे हैं ; पेंड लद जाते हैं| देखकर मन का मोर नाच उठता है| फलो का स्वाद लेने के लिए मुंह में पानी भर जाता है| अन्दर से भूख जागते लगाती है| फल हमारी भूख मिटाते हैं| भूख ही नहीं मिटाते , हमारी शक्ति भी बढ़ाते हैं,हमें रोंगों के सामना करने करने की शक्ति देते हैं, विटामिन्स और खनिज देते हैं, अनेक रोगों का इलाज भी करते हैं| अब बताइए, वे हमारे हैं की नहीं?

                                                            पेंड-पौधे हमारे हैं तो इन्हें कष्ट क्यों दें? अपनों को कोई दुःख देता है क्या? इनको पत्थर मारना ठीक नहीं| इनको चोट लगेगी तो इन्हें दुःख होगा|इनका दुःख भी हमारा दुःख ही तो है| अत: किसी पेंड को पत्थर मत मरो, उसे मत तोड़ों|

                                                                                                    पेंड़ो की पत्तिया वास्तव में पेंड़ो के कपड़ें हैं| जैसा आप कपड़ें पहनते हैं तो अछे लगते हैं| यदि आपके कोई कपडे फाड़ दे तो आपको बुरा लगेगा की नहीं ? इसी प्रकार, यही हम बेमतलब पेंड़ो की पत्तिया टोंड- तोंड़कर फेंक देंगे तो पेंड देखने में सुन्दर नहीं लगेगा और बहुत कष्ट भी होता होगा | क्या हम अपनों को इस तरह पीड़ित करना ठीक समझते हैं? नहीं,सचमुच नहीं| आप भी पेंड़ो को बिना पतों का देखकर खुश नहीं होंगे|

 

पंखा (Fan)

गर्मी में यदि पंखा न हो तो क्या आप जीवन की कल्पना कर सकते हैं? वर्तमान समय में गर्मी से बचाव के लिए एयरकंडिशनर, कूलर आदि अनेक वस्तुओ का निर्माण हो गया है; लेकिन पंखे की जगहपर कोई नहीं ले पाया| पंखा एक आवश्यक उपकरण है| बाजार में तरह-तरह के पंखे मौजूद हैं| हाथ के पंखे तो बहुत पहले से चले आ रहे हैं| प्राचीन मिस्र, जापान और चीन में हाथ के पंखे का प्रयोग करते है  


बाबा खड़क सिंह

बाबा खड़क सिंह इंडो-ब्रिटिश इतिहास के सबसे चमकते सितारों में से एक थे| उनका पंजाब में राजनितिक चैतन्य से जुड़ा हुआ है| उनका जन्म सियालकोट के एक कुलीन परिवार में हुआ था| उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी,लाहौर से स्नातक की पढाई की| उन्होंने अपना सार्वजनिक जीवन सन 1912 में आरंभ किया था, लेकिन 1919 में जलियाँवाला बाग में नर-संहार होने पर वे सिख राजनीति के केंद्र में आ गए थे| वे सन 1921 में शिरोमणी गुरुद्वरा प्रबंधक कमेटी के पहले अध्यक्ष चुने गए| उन्होंने ब्रिटिश आंदोलन के खिलाफ पहले आंदोलन का सफलता पूर्वक नेतृत्व किया| वह स्वर्ण मंदिर के खजाने की उन चाबियों को लौटाने के लिए सिखों के लिए प्रदर्शन था, जिन्हें अमृतसर के ब्रिटिस डिप्टी कमिश्नर ने अपने कब्जे में ले लिया था| खड़क सिंह गिरफ्तार होने वाले पहाटे व्यक्ति थे, लेकिन उन्होंने आन्दोलन जारी रखा और आखिरकार शासकों को बाबा की लौह इच्छा-शक्ति के आगे झुकाना पड़ा| 17 जनवरी, 1922 को अकाल तख़्त पर एक सावर्जनिक समारोह के दौरान ब्रिटिस साम्राज्य के प्रतिनिधियों ने उन्हें चाबियां सौंप दीं| इसके बाद उनकी जीवन-यात्रा देश के लिए संधर्ष पर चल पड़ी| वे अपने कारखाने में कृपाण बनाने और ब्रिटिस शासन के खिलाफ भाषण देने आदि के कारण कई बार जेल गए| उन्हें दूर डेरा गाजी खां की जेल में भेज दिया गया| वहां उन पर बहुत सख्ती राखी गई| उन्हें राष्ट्रवादी कपड़े तक पहनने से मना कर दिया गया| बाबा खड़क सिंह ने देश के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया| 


भारत का राष्ट्रीय – गीत

जन- गण- मन अधिनायक जय हे,

भारत - भाग्य- विधाता |

पंजाब सिंध गुजरात मराठा,

द्रविड़ उत्कल बंग||

विन्ध्य हिमाचल यमुना गंगा,

उच्छल – जलधि तिरंगा||

तव शुभ नामें जागे,

तव शुभ- आशिष मांगें|

गाहे तव जय गाथा,

जन-गन मंगल- दायक जय हे|

भारत - भाग्य – विधाता,

जय हे! जय हे ! जय हे!

जय जय जय जय हे||

 

राष्ट्रीय गीत के बाद नारा

वन्दे - मातरम

भारत माता की - जय|

महात्मा गाँधी -  अमर रहे

 

 

राष्ट्रीय वंदना

वन्दे मातरम्

सुजलाम, सुफलाम मलयजशीतलाम,

शस्य श्यामलाम मातरम|

शुभ्र- ज्योत्स्नाम- पुलकित यामिनीम ,

फुल्ल कुसुमित द्रुमदल शोभिनिम,

सुहासीनीम, सुमधुरभाशिनिम

सुखदां, वरदां मातरम वन्दे मातरम


देश भक्ति गाना

इंसाफ के डगर पे बच्चो दिखाओ चलके,

यह देश है तुम्हारा, नेता तुम्ही हो कल के|

दुनियां के रंज सहना,

और कुछ न मुहँ से कहना,

सचाइयों के बल पे ,

आगे ही बढतें रहना |

रख दोगे  एक दिन तुम संसार के बदल को बदल के,

इंसाफ के डगर पे बच्चो दिखाओ चलके,

यह देश है तुम्हारा, नेता तुम्ही हो कल के|

अपने हो या पराये सबके लिए हो न्याय,

देखो कदम तुम्हारा हरगिज न डगमगाये|

रस्तें बड़े कठिन है चलना संभल संभल के,

इंसाफ के डगर पे बच्चो दिखाओ चलके,

यह देश है तुम्हारा, नेता तुम्ही हो कल के|

इंसानियत के सर पे, इज्जत का ताज रखना,

तन-मन की भेंट देकर भारत की लाज रखना|

जीवन नया मिलेगा अंतिम चिता में जल के,

इंसाफ के डगर पे बच्चो दिखाओ चलके,

यह देश है तुम्हारा, नेता तुम्ही हो कल के|

 

 भारत का रहने वाला हूँ

है प्रीत जहाँ की रीत सदा मैं गीत वहां का गता हूँ

भारत का रहने वाला हूँ भारत की बात सुनाता हूँ|

है प्रीत जहाँ की रीत सदा मैं गीत वहां का गता हूँ

काले गोरे का भेद नहीं हर दिल से हमारा नाता है

कुछ और न आता हो हमको,

हमें प्यार निभना आता है जिसे मान चुकी सारी दुनियाँ

मैं बात वही दोहराता हूँ|

है प्रीत जहाँ की रीत सदा मैं गीत वहां का गता हूँ

भारत का रहने वाला हूँ भारत की बात सुनाता हूँ|

जीते हो किसी न देश तो

क्या हमने तो दिलों का जीता है

जहाँ राम अभी तक है नर में,

नारी में अभी तक सीता है

इतने पावन है लोग यहाँ मैं

नित्य- नित्य शीश झुकाता हूँ

है प्रीत जहाँ की रीत सदा मैं गीत वहां का गता हूँ

भारत का रहने वाला हूँ भारत की बात सुनाता हूँ|

इतनी ममता नदियों को भी, जहाँ माता कह  के पुकारतें हैं

इतना आदर इन्सान तो क्या, पत्थर भी पूजे जातें हैं

 उस धरती पे मैंने जन्म लिया,

ये सोच के मैं इतराता हूँ |

है प्रीत जहाँ की रीत सदा मैं गीत वहां का गता हूँ

भारत का रहने वाला हूँ भारत की बात सुनाता हूँ|

 

ऐ मेरे वतन के लोगों

ऐ मेरे वतन के लोगों ,

तुम खूब लगा लो नारा,

ये शुभ दिन है हम सबका,

लहरा लो तिरंगा प्यारा|

पर मत भूलो सीमा पर,

वीरों ने हैं प्राण गवाएं

कुछ याद उन्हें भी कर लो ,

जो लौटकर घर न आयें|

ऐ मेरे वतन के लोगों जरा आँख, में भर लो पानी

जो शहीद हुयें हैं उनकी, जरा याद करो कुर्बानी

जब घायल हुआ हिमालय खतरे में पड़ी आज़ादी

जब तक थी साँस लड़े वो, फिर अपनी लाश बिछा दी

संगीन पर रखकर माथा, सो गए अमर बलिदानी

जो शहीद हुयें हैं उनकी, जरा याद करो कुर्बानी

जब देश में थी दीवाली, वे खेल रहे थे होली

जब हम बैठे थे घरों में , वो झेल रहे थे गोली|

थे धन्य जवान और अपने, धन्य थी उनकी जवानी

 

कोई सिक्ख ना कोई मराठा, कोई गोरखा न मद्रासी|

सरहद पर मरनेवाले , हर वीर था भारतवासी ,

जो खून गिरा पर्वत पर वो खून था हिन्दुस्तानी|

जो शहीद हुयें हैं उनकी, जरा याद करो कुर्बानी

थी खून से लथपथ काया, फिर भी बन्दुक उठाके ...

दस दस को एक ने मारा, फिर गिर गए होस गवाके |

जब अंत समय आया, तो कह गए की अब मरते हैं|

खुश रहना देश के प्यारों, अब हम तो सफ़र करतें हैं|

क्या लोग थे वो दीवाने, क्या लोग थे वो अभिमानी

जो शहीद हुए हैं उनकी, जरा याद करो कुर्बानी

जय हिन्द! जय हिन्द! जय हिन्द की सेना|

 

 राष्ट्रीय गीत

जन-गण-मन अधिनायक जय !हे,

भारत-भाग्य विधाता|

पंजाब सिंध गुजरात मराठा,

द्राविड उत्कल बंग||

विन्ध हिमालय यमुना गंगा,

उल्छल-जलधि तरंगा||

तव शुभ नामे जगे,

गाहे तव जय गाथा,

जन-गण मंगल दायक जय हे|

भारत भाग्य विधाता,

जय हे! जय हे! जय हे!

जय जय जय जय हे||

|| वन्दे मातरम् ||

 

राष्ट्रीय ध्वज वन्दना   

हिन्द देश का प्यारा झंडा ऊँचा सदा रहेगा|

तूफानी और बादलों से भी नहीं झेकेगा|

नहीं झुकेगा नहीं झुकेगा,झंडा नहीं झुकेडा| हि.

केसरिया बल भरने वाले वाला सदा है सच्चाई|

हरा रंग है हरी हमारी धरती की अंगड़ाई|

कहता है यह च्रक हमारा कदम कभी नहीं रुकेगा| हि.

शान हमारी यह झंडा है,

यह अरमान हमारा |

यह बल पौरुष है सदियों का,

यह बलिदान हमारा  |

आसमान में फहराये यह  |

सागर में फहराये   |

जहाँ – जहाँ जाये झंडा,

यह सन्देश सुनाये  |

है आजाद हिन्द यह दुनिया को आजाद करेगा |हि.

नहीं चाहते हम दुनिया को अपना दास बनाना  |

नहीं चाहते हम औरों के मुहं की रोटी खा जाना |

सत्य नयाय के लिए हमारा लह्हू सदा बहेगा | हि.

हम कितने सुख सपने लेकर इसको फहराते हैं|

इस झंडे पर मर मिटने को कसम सभी खाते हैं|

हिन्द  देश का यह झंडा घर- घर में लहरायेगा | 




राम रेखा धाम  

अत्यंत रमणीय और पावन स्थल है झारखण्ड का रामरेखा धाम| यह आस्था का केंद्र भी है और एतिहासिक धरोहर भी| झारखण्ड एवं छातिगढ़ की सीमा पर अपने आप में प्राकृतिक सौन्दर्य को समेटे यह पवित्र आस्थ का केंद्र भगवान श्रीराम से जुड़ी स्मृतियों से अवगत कराता है| तभी तो हर मौसम में श्रद्धालु एवं पर्यटक बड़ी श्रद्धा व उल्लास के साथ यहाँ पहुचते हैं|

                                                                                           पौराणिक मान्याताओ के अनुसार, यही वह पवित्र स्थल है, जहाँ कभी त्रेता युग में मर्यादा पुरुषोतम श्रीराम ने पाने चरण रखे थे| जमीन तल से सैकड़ो फिट ऊपर हरे- भरे जंगल एवं पहाड़ो से धीरे इस धाम में कई ऐसे तथ्य हैं, जो वन- गमन के क्रम में भगवान श्रीराम के झारखण्ड पधारने की घटना के प्रमाण प्रस्तुत करते हैं| धाम में अभी भी प्राचीन काल से श्याम वर्ण का शंख लोगो के मन में काफी उत्सुकता पैदा करता है| धाम से जुडी लोगो को कहना है की भगवान श्रीराम इस धाम पर दो बार आये थे| पहलों बार वन गमन के दौरान तथा दूसरी बार राजगद्दी के उपरांत| धाम की चटानो पर कई आकृतिया बनी हैं, जो स्थल से जुडी कहानियो और तथ्यों पर प्रकाश डालती हैं|  धाम में झुकी हुई विशालकाय गुफा के अन्दर बनी लकिरानुमा आकृति ही ‘राम रेखा’ के नाम से जनि जाती है| धाम परिसर में धनुस कुंड, गुप्त गंगा, अग्नि कुंड इत्यादि 


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